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Daily Current Affairs and GK

विश्व महासागर दिवस पर, नैशनल ज्यॉग्रैफिक (National Geographic) ने आधिकारिक तौर पर अंटार्कटिक के आसपास के पानी की बॉडी को दक्षिणी महासागर के रूप में मान्यता देने की घोषणा की, जिससे यह आर्कटिक, अटलांटिक, भारतीय और प्रशांत के साथ पांचवां महासागर बन गया.

नैशनल ज्यॉग्रैफिक  सोसाइटी (National Geographic Society) ने दुनिया के महासागरों की मैपिंग की है. संगठन ने घोषणा की कि वह दक्षिण महासागर (Southern Ocean), अंटार्कटिका को घेरने वाले पानी के एक निकाय को दुनिया के पांचवें ओशन के रूप में मान्यता देगा.

How many oceans does Earth have? National Geographic now says 5. | The  Seattle Times

जब से नैशनल ज्यॉग्रैफिक  ने 1915 में मानचित्र बनाना शुरू किया, इसने चार महासागरों को मान्यता दी: अटलांटिक, प्रशांत, भारतीय और आर्कटिक महासागर. विश्व महासागर दिवस 8 जून, 2021 को इसने दक्षिणी महासागर को दुनिया के पांचवें महासागर के रूप में मान्यता दी.

नैशनल ज्यॉग्रैफिक सोसाइटी के भूगोलवेत्ता एलेक्स टैट (Alex Tait) के अनुसार, "दक्षिणी महासागर को लंबे समय से वैज्ञानिकों द्वारा मान्यता प्राप्त है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कभी समझौता नहीं हुआ था, इसलिए हमने इसे आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी थी".

आम तौर पर, नैशनल ज्यॉग्रैफिक ने समुद्री नामों पर अंतर्राष्ट्रीय हाइड्रोग्राफिक संगठन (International Hydrographic Organization, IHO) का अनुसरण किया है. IHO भौगोलिक नामों पर संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के समूह के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नामों को मानकीकृत करने के लिए काम करता है.

IHO ने अपने 1937 दिशानिर्देशों में दक्षिणी महासागर को मान्यता दी लेकिन विवाद के कारण 1953 में इस पदनाम को निरस्त कर दिया गया. इसने इस मामले पर तब से विचार-विमर्श किया है, लेकिन अभी तक दक्षिणी महासागर को बहाल करने के लिए अपने सदस्यों से पूर्ण सहमति प्राप्त नहीं हुई थी.

हालांकि, U.S. बोर्ड ऑन ज्यॉग्रैफिक नेम्स (U.S. Board on Geographic Names) ने 1999 से इस नाम का इस्तेमाल किया है. और इस साल फरवरी में, NOAA ने आधिकारिक तौर पर दक्षिणी महासागर को अलग ओशन के रूप में मान्यता दी.

एलेक्स टैट कहते हैं कि परिवर्तन, दुनिया के महासागरों के संरक्षण के लिए सोसाइटी की पहल के साथ संरेखित करता है, एक क्षेत्र पर जन जागरूकता को केंद्रित करता है, विशेष रूप से एक संरक्षण स्पॉटलाइट की आवश्यकता होती है. आगे उन्होंने कहा "यह परिवर्तन अंतिम कदम था और हम इसे पारिस्थितिक अलगाव के कारण पहचानना चाहते हैं".

नैशनल ज्यॉग्रैफिक अब पांच विश्व महासागरों को मान्यता देता है. ड्रेक पैसेज (Drake Passage) और स्कोटिया सागर (Scotia Sea) को छोड़कर, अंटार्कटिका को 60 डिग्री दक्षिण अक्षांश तक घेरने वाले अधिकांश जल, नए स्वीकृत दक्षिणी महासागर का निर्माण करते हैं.

जबकि अन्य महासागरों को उन महाद्वीपों द्वारा परिभाषित किया जाता है जो उन्हें घेरते हैं, दक्षिणी महासागर को एक धारा (Current) द्वारा परिभाषित किया जाता है.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट (Antarctic Circumpolar Current, ACC) लगभग 34 मिलियन वर्ष पहले स्थापित किया गया था, जब अंटार्कटिका दक्षिण अमेरिका से अलग हुआ था. इसने पृथ्वी के तल के चारों ओर पानी के निर्बाध प्रवाह की अनुमति दी थी.

ACC अंटार्कटिका के चारों ओर पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है, एक व्यापक उतार-चढ़ाव वाले बैंड में, जो लगभग 60 डिग्री दक्षिण के अक्षांश के आसपास केंद्रित है. यह वह रेखा है जिसे अब दक्षिणी महासागर की उत्तरी सीमा के रूप में परिभाषित किया गया है. ACC के अंदर, पानी ठंडा है और उत्तर में समुद्र के पानी की तुलना में थोड़ा कम खारा है.

सतह से समुद्र तल तक फैले हुए, ACC किसी भी अन्य महासागरीय प्रवाह की तुलना में अधिक पानी का परिवहन करता है. यह अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागरों से पानी खींचता है, जिससे एक वैश्विक परिसंचरण प्रणाली को चलाने में मदद मिलती है जिसे कन्वेयर बेल्ट (Conveyor belt) के रूप में जाना जाता है, जो ग्रह के चारों ओर हीट का परिवहन करता है.

ठंडा, घना पानी जो अंटार्कटिका से दूर समुद्र तल में डूब जाता है, गहरे समुद्र में कार्बन जमा करने में भी मदद करता है. उन दोनों तरीकों से, दक्षिणी महासागर का पृथ्वी की जलवायु पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है.

वैज्ञानिक वर्तमान में अध्ययन कर रहे हैं कि मानव संचालित जलवायु परिवर्तन दक्षिणी महासागर को कैसे बदल रहा है.

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पीसीएस-2018 में चयनित अभ्यर्थियों का पदवार एवं श्रेणीवार कटऑफ मंगलवार को जारी कर दिया। 988 पदों के लिए 11 सितंबर 2020 को अंतिम परिणाम घोषित हुआ था। 1600 अंकों की परीक्षा में 1014 नंबर पाने वाले अभ्यर्थी ने टॉप किया था। पहले 1700 अंकों की परीक्षा होती थी लेकिन पीसीएस-2018 से साक्षात्कार 200 की बजाय 100 नंबर का होने के कारण पूर्णांक 1600 रह गया है।

प्रारंभिक परीक्षा 28 अक्टूबर 2018 को हुई थी। प्री का परिणाम 30 मार्च 2019 को आया, जिसमें मुख्य परीक्षा के लिए 19,096 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए थे। उसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर 160 महिला अभ्यर्थियों को 5 अक्टूबर 2019 को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया। 18 से 22 अक्टूबर 2019 तक मुख्य परीक्षा हुई जिसका परिणाम 23 जून 2020 को जारी हुआ। 15 जुलाई से 25 अगस्त 2020 तक इंटरव्यू हुआ था।

कुल 988 पदों के लिए 2669 अभ्यर्थी साक्षात्कार में शामिल हुए थे। परीक्षा नियंत्रक अरविंद मिश्र की ओर से जारी सूचना के मुताबिक कटऑफ अंक 25 जनवरी तक वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा। अभ्यर्थी पीसीएस परीक्षा से जुड़ी किसी भी सूचना के लिए आयोग की वेबसाइट uppsc.up.nic.in को भी देख सकते हैं।

विभिन्न पदों के लिए कटऑफ

पद का नाम---------------अनारक्षित---------------ओबीसी-----------एससी एसटी

अधिकतम--न्यूनतम--अधिकतम-- न्यूनतम--अधिकतम--- न्यूनतम--अधिकतम न्यूनतम
डिप्टी कलेक्टर 1014--- 954---971--924--952--892-- 834--827

डिप्टी एसपी ---------------955 927 921 903 ---------------884 867--------------- 819 818
असिस्टेंट कमिश्नर

वाणिज्य कर    ---------------945 921 919 913 891 869                        
सहायक संभागीय

परिवहन अधिकारी ---------------953 950 921 921 891 889                        
खंड विकास अधिकारी 923 917 913 907 868 860                        

जिला कमांडेंट होमगार्ड्स 916 916 909 909 ---------------865 865                        
अधीक्षक कारागार ---------------919 913 903 903--------------- 878 878                        

अधिशासी अधिकारी
श्रेणी 1 केवल लिखित परीक्षा 890 890                                                                                                

लेखाधिकारी
केवल लिखित परीक्षा 874 874 862 854                                                

वाणिज्य कर
अधिकारी 920 895 896 877---------------856 825---------------809 809

कटऑफ में स्केल्ड अंक न होने पर छात्रों ने उठाए सवाल

पीसीएस 2018 के कटऑफ में स्केल्ड और नॉन स्केल्ड अंकों का जिक्र न होने पर अभ्यर्थियों ने लोक सेवा आयोग की मंशा पर सवाल उठाए हैं। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति का दावा है कि अंतिम परिणाम में स्केलिंग नहीं हुई है क्योंकि विषय का नंबर दशमलव में नहीं आया है। क्षैतिज आरक्षण की भी अलग से मेरिट जारी नहीं की गई है।

समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय ने परिणाम की सीबीआई जांच की मांग की है। उनका कहना है कि मार्कशीट देखने से पूरी तरह स्पष्ट है कि आयोग ने विषयों में स्केलिंग नहीं की है। पीसीएस 2017 में अनारक्षित वर्ग का कटऑफ 877.27 व ओबीसी का 855.36 था। पीसीएस 2016 में अनारक्षित वर्ग का कटऑफ 897.04 व ओबीसी का 893.04 था।

इस बार कटऑफ में दशमलव नहीं है। आयोग का यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना है। स्केलिंग न करने का ही परिणाम है कि हिन्दी पट्टी के प्रतियोगी छात्रों का चयन सूची से सफाया हो गया है। पहली बार महिला वर्ग का अलग से कटऑफ अंक घोषित नहीं किया गया है। सभी महिला अभ्यर्थी अपनी-अपनी श्रेणी की श्रेष्ठता में समायोजित लिखा है।

समिति के मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय का दावा है कि आयोग का यह रवैया मनमानापूर्ण है और समिति हर स्तर पर इसका विरोध करेगी। समिति को पहले से आशंका थी इसीलिए आयोग को ज्ञापन देकर रिजल्ट जारी करने की मांग करता रहा। इसीलिए आरटीआई से भी सूचना मांगी लेकिन जवाब नहीं दिया। पीसीएस 2018 में जीएस व हिंदी निबंध में जिन अभ्यर्थियों को अच्छा नंबर मिला था उन्हें विषय में कम नंबर दिया गया।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक कंपोजिट डिजिटल पेमेंट इंडेक्स (DPI) का निर्माण किया है। इस इंडेक्स से यह पता चलेगा कि देशभर में पेमेंट्स का किस स्तर तक डिजिटाइजेशन हुआ है। इस इंडेक्स में 5 मुख्य पैरामीटर्स होंगे।

ये 5 पैरामीटर्स अलग-अलग समयावधि में देश में डिजिटल पेमेंट्स के पेनीट्रेशन का आकलन करने में मदद करेंगे। RBI के बयान के मुताबिक ये पैरामीटर्स हैं- पेमेंट इनेबलर्स, पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-डिमांड साइड फैक्टर्स, पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-सप्लाई साइड फैक्टर्स, पेमेंट परफॉर्मेंस और कंज्यूमर सेंट्रिसिटी। इनमें से हर एक पैरामीटर के अंदर कुछ सब-पैरामीटर्स होंगे और हर एक सब-पैरामीटर के अंदर कई मापने लायक इंडिकेटर्स होंगे।

इन 5 पैरामीटर्स से तय होगा इंडेक्स का परफॉर्मेंस

  1. पेमेंट इनेबलर्स (वेटेज 25%)
  2. पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-डिमांड साइड फैक्टर्स (वेटेज 10%)
  3. पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-सप्लाई साइड फैक्टर्स (वेटेज 15%)
  4. पेमेंट परफॉर्मेंस (वेटेज 45%)
  5. कंज्यूमर सेंट्रिसिटी (वेटेज 5%)
RBI-DPI को मार्च 2018 की अवधि के आधार पर किया गया है। इसका मतलब है कि मार्च 2018 के लिए DPI स्कोर 100 पर सेट किया गया है। RBI ने DPI की गणना क्रमशः मार्च 2019 और मार्च 2020 के लिए 153.47 और 207.84 पर की है, जो प्रशंसनीय वृद्धि का संकेत देता है। RBI-DPI को मार्च 2021 से 4 महीने के अंतराल के बाद अर्ध-वार्षिक आधार पर प्रकाशित किया जाएगा।

28 जनवरी 2020 को मेडागास्कर में चक्रवात आने की वजह से नौसेना ने ऑपरेशन 'वनीला' की शुरूआत की हैं जिसमें चक्रवात से प्रभावित लोगों की मदद की जाएगी और इसके लिए भारतीय नौसेना के ऐरावत को काम में लिया जा रहा हैं। वनीला ऑपरेशन को चक्रवात डायने द्वारा मचाई गई तबाही के बाद मेडागास्कर के प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करने हेतु शुरू किया गया है।

भारतीय नौसेना के अनुसार "INS ऐरावत, को इस मिशन के लिए तैनात किया गया हैं, तथा जिसे उसी तरफ डायवर्ट कर दिया गया है"। भारतीय नौसेना जहाज चिकित्सा शिविर स्थापित करने और भोजन, पानी और अन्य आवश्यक राहत सामग्री प्रदान करने के लिए तैयार है।

मेडागास्कर को सहायता भारतीय नौसेना की विदेश सहयोग की पहल के तहत प्रदान की जा रही हैं, जो प्रधानमंत्री की 'Security and Growth for all in the Region (SAGAR)' 'सुरक्षा और क्षेत्र में सभी के लिए विकास' (SAGAR) के दृष्टिकोण के अनुरूप है। भारतीय नौसेना हिंद महासागर में मानवीय और आपदा राहत (HADR) के लिए सहायता देने वाला पहला संगठन है।

G-7 या द ग्रुप ऑफ़ सेवन (G7) एक अंतरराष्ट्रीय अंतर सरकारी आर्थिक संगठन है जिसमें दुनिया की सात सबसे बड़ी IMF द्वारा बतायी गयीं विकसित अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं. G-7 की स्थापना सन 1975 में 6 विकसित देशों (फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) ने की थी.अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसका विस्तार करके G-10 या G-11 बनाना चाहते हैं जिसमें भारत भी शामिल होगा.

G–7 की 45 वीं बैठक फ़्रांस के बिआरिट्ज शहर में 24 से 26 अगस्त के बीच हुई जिसमें भारत की ओर से प्रधानमन्त्री मोदी ने भाग लिया था.

G–7 के सदस्य देश (Members of G-7)

विश्व के 7 सबसे विकसित राष्ट्र (फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंग्डम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा) विश्व की समस्याओं पर सभी का ध्यान दिलाने के लिए हर साल किसी देश में विचार विमर्श के लिए इकट्ठे होते हैं.

G–7, विश्व के सर्वोच्च सम्पन्न औद्योगिक देशों– फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंग्डम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा  का एक संघ है। यह समूह आर्थिक विकास एवं संकट प्रबंधन, वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा एवं आतंकवाद जैसे वैश्विक मुद्दों पर आमसहमति को बढ़ावा देने के लिए सालाना बैठक का आयोजन करता हैं।

G– 6 फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और अमेरिका से बना था। इसके बाद 1976 में इस समूह में कनाडा के शामिल होने के बाद यह G– 7 और 1998 में रूस के शामिल होने पर G– 8 बन गया. विभिन्न समयों पर G-7 का नाम G-8 भी हो जाता है और अब इसमें भारत,ऑस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण कोरिया को शामिल होने के बाद इसके G-11 होने आसार हैं. 

ये देश दुनिया के सबसे अधिक औद्योगिक गतिविधियों वाले देश हैं । G–7 का पहला शिखर सम्मेलन नवंबर 1975 में पेरिस के नजदीक रैमबोनीलेट (Rambonilet) में आयोजित किया गया था। वर्ष 2018 में G– 7 समूह के सदस्य देशों का वैश्विक निर्यात में 49%, विश्व की जीडीपी का 46% और दुनिया के कुल धन के 58% का मालिक है. औद्योगिक आउटपुट में 51% और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के परिसंपत्तियों में 49% हिस्सेदारी है।

G–20 (ग्रुप-20):-
सितंबर 1999 में G–7 देशों के वित्त मंत्रियों ने G–20 का गठन एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच के तौर पर किया था जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के साथ ब्रेटन वुड्स संस्थागत प्रणाली की रूपरेखा के भीतर आने वाले व्यवस्थित महत्वपूर्ण देशों के बीच अनौपचारिक बातचीत एवं सहयोग को बढ़ावा देता।

बीस का समूह (G–20) अपने सदस्यों के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और कुछ मुद्दों पर निर्णय करने के लिए प्रमुख मंच है। इसमें 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल है। 

G–20 के नेता वर्ष में एक बार बैठक करते हैं; इसके अलावा, वर्ष के दौरान, देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक के गवर्नर वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार लाने, वित्तीय नियमन में सुधार लाने और प्रत्येक सदस्य देश में जरुरी प्रमुख आर्थिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए नियमित रूप से बैठक करते रहते हैं। इन बैठकों के अलावा वरिष्ठ अधिकारियों और विशेष मुद्दों पर नीतिगत समन्वय पर काम करने वाले कार्य समूहों के बीच वर्ष भर चलने वाली बैठकें भी होती हैं।

G–20 की शुरुआत, 1999 में एशिया में आए वित्तीय संकट के बाद वित्त मंत्रियों और सेंट्रल बैंक के गवर्नरों की बैठक के तौर पर हुई थी। वर्ष 2008 में G–20 के नेताओं का पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था और समूह ने वैश्विक वित्तीय संकट का जवाब देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी निर्णायक और समन्वित कार्रवाई ने उपभोक्ता और व्यापार में भरोसा रखने वालों को शक्ति दी और आर्थिक सुधार के पहले चरण का समर्थन किया। वर्ष 2008 के बाद से G–20 के नेता आठ बार बैठक कर चुके हैं।

G–20 शिखर सम्मेलन में रोजगार के सृजन और मुक्त व्यापार पर अधिक जोर देने के साथ वैश्विक आर्थिव विकास को समर्थन देने के उपायों पर फोकस जारी है। प्रत्येक G–20 अध्यक्ष हर वर्ष कई अतिथि देशों को आमंत्रित करता है।
G–20– वित्तीय स्थिरता बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के साथ मिलकर काम करता है। कई अन्य संगठनों को भी G–20 की प्रमुख बैठकों में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

G–20 के सदस्य: (Members of G-20)-
G–20 के सदस्य वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का करीब 85%, वैश्विक व्यापार के 75% और विश्व की आबादी के दो– तिहाई से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं।

G–20 के सदस्य हैं– अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, मैक्सिको, रूस, सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ।

जी 20 शिखर सम्मेलन
             तिथि                          स्‍थान
1.     14-15, नवंबर, 2008        वाशिंगटन, अमेरिका
2.     2 अप्रैल, 2009                लंदन, यूनाईटेड किंगडम
3.     24-25, सितंबर, 2009       पीट्सबर्ग, अमेरिका
4.     26-27, जून, 2010          टोरंटो, कनाडा
5.     11-12, नवंबर, 2010        सियोल, दक्षिण कोरिया
6.     3-4, नवंबर, 2011           कान्स, फ्रांस
7.     18-19 जून, 2012           लॉस कॉबोस, मेक्सिको
8.     5-6, सितंबर, 2013          सेंट पीटर्सबर्ग, रूस
9.     15-16 नवंबर, 2014         बि्रसबेन, ऑस्‍ट्रेलिया
10.   15-16 नवंबर, 2015         अंतालिया तुर्की

11. 4-5 सितंबर 2016              हांगझोऊ, चीन

12. 7-8 जुलाई 2017              हैम्बर्ग, जर्मनी

13.  30 नवंबर - 1 दिसंबर 2018 ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना

14. 28-29 जून, 2019            ओसाका, जापान

जिस तरह से हर व्यक्ति को पोषक तत्वों की जरूरत होती है, उसी तरह से पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इन पोषक तत्वों के न मिल पाने से पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है। वैज्ञानिक परीक्षणो के आधार पर 17 तत्वों को पौधो के लिए जरूरी बताया गया है, जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में लेते हैं, इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में देना जरूरी है। इसके अलावा कैल्सियम, मैग्नीशियम और सल्फर की आवश्यकता कम होती है अतः इन्हें गौण पोषक तत्व के रूप मे जाना जाता है इसके अलावा लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल की पौधो को कम मात्रा में जरूरत होती है।

1- नत्रजन के प्रमुख कार्य

  • नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है तथा पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है। नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है-
  • यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है।
  • वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
  • अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है।
  • यह दानो के बनने में मदद करता है।

नत्रजन-कमी के लक्षण

  • पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना। निचली पत्तियाँ झड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं।
  • पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना।
  • फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना।

2- फॉस्फोरस के कार्य

  • फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन जल्द होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स व फाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
  • यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है।
  • फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढ़ती है।
  • फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा मजबूत होती हैं। पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है।
  • इससे फल जल्दी आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने जल्दी पकते हैं।
  • यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है।

फॉस्फोरस-कमी के लक्षण

  • पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है। फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं। दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं।
  • पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं।
  • अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीज का निर्माण सही न होना।
  • इसकी कमी से आलू की पत्तियां प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।

3- पोटैशियम के कार्य

  • जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
  • स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
  • अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है। सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है। मृदा में नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है।

पोटैशियम-कमी के लक्षण

  • पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं।
  • पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं।
  • इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है
  • पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है।

4- कैल्सियम के कार्य

  • यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है।
  • यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है।
  • यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।

कैल्सियम-कमी के लक्षण

  • नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना।
  • जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना।
  • फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना।

5- मैग्नीशियम के कार्य

  • क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है।
  • पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
  • पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है।
  • चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।

मैग्नीशियम-कमी के लक्षण

  • पत्तियां आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं।
  • दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना।

6 गन्धक (सल्फर) के कार्य

  • यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
  • विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
  • यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये जरूरी है। तम्बाकू की पैदावार 15-30 प्रतिशत तक बढ़ती है।

गन्धक-कमी के लक्षण

  • नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
  • मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
  • ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाना।

7- लोहा (आयरन) के कार्य

  • लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
  • क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
  • यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।

लोहा-कमी के लक्षण

  • पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
  • नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
  • धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।

8- जस्ता (जिंक) के कार्य

  • कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है।
  • हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
  • यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।

जस्ता-कमी के लक्षण

  • पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
  • गेहूं में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
  • फलों का आकार छोटा व बीज की पैदावार का कम होना।
  • मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
  • धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।

9- ताँबा (कॉपर ) के कार्य

  • यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
  • ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
  • अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।

ताँबा-कमी के लक्षण

  • फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
  • अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों में रिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।

10- बोरान के कार्य

  • पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
  • दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
  • यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
  • यह डीएनए, आरएनए, एटीपी पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है

बोरान-कमी के लक्षण

  • पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
  • पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
  • बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप-सिकनेस नामक बीमारी का लगना।

11- मैंगनीज के कार्य

  • क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
  • पौधों में ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
  • प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।

मैंगनीज-कमी के लक्षण

  • पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
  • अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रंग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोग पैदा होता है। जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।

12- क्लोरीन के कार्य

  • यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
  • पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाता है।

क्लोरीन-कमी के लक्षण

  • गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
  • कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
  • पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।

13- मालिब्डेनम के कार्य

  • यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
  • यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
  • पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।

मालिब्डेनम-कमी के लक्षण

  • सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं।
  • पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
  • टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
  • इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
  • नीबू जाति के पौधो में मॉलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता है।

देश की श‍िक्षा नीति में 34 साल बाद नये बदलाव किए गए हैं. 29.07.2020 को इस नई श‍िक्षानीति को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी. नई शिक्षा नीति (New Education Policy) के तहत बोर्ड परीक्षा (Board Exams) को सरल बनाने, पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के साथ ही बचपन की देखभाल और शिक्षा पर जोर देते हुए स्कूल पाठ्यक्रम के 10+2 ढांचे में बदलाव किया गया है.

नई श‍िक्षा नीति में स्कूल के बस्ते, प्री प्राइमरी क्लासेस से लेकर बोर्ड परीक्षाओं, रिपोर्ट कार्ड, यूजी एडमिशन के तरीके, एमफिल तक बहुत कुछ बदला है. यहां जानें आख‍िर न्यू एजुकेशन पॉलिसी में इतने सालों बाद क्या बदला है.

इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षाओं को इसके दायरे में लाया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य है कि छात्रों को पढ़ाई के साथ साथ किसी लाइफ स्‍क‍िल से सीधा जोड़ना.

अभी तक आप आर्ट, म्यूजिक, क्राफ्ट, स्पोर्ट्स, योग आदि को सहायक पाठ्यक्रम (co curricular) या अतिरिक्त पाठ्यक्रम (extra curricular) एक्ट‍िविटी के तौर पर पढ़ते आए हैं. अब ये मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे, इन्हें एक्स्ट्रा करिकुलर एक्ट‍िविटी भर नहीं कहा जाएगा.

अभी तक शादी होने या किसी के बीमार होने पर किसी की पढ़ाई बीच में छूट जाती थी. अब ये व्यवस्था है कि अगर किसी कारण से पढ़ाई बीच सेमेस्टर में छूट जाती है तो इसे मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम के तहत आपको लाभ मिलेगा. मतलब अगर आपने एक साल पढ़ाई की है तो सर्टिफिकेट, दो साल की है तो डिप्लोमा मिलेगा. तीन या चार साल के बाद डिग्री दी जाएगी.

सरकार ने तय किया है कि अब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का कुल 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च होगा. फिलहाल भारत की जीडीपी का 4.43% हिस्सा शिक्षा पर खर्च होता है. वहीं मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर अब शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है. ये भी बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव है.

आयोग ने शिक्षकों के प्रशिक्षण पर खास जोर दिया है. जाहिर है कि एक अच्छा टीचर ही एक बेहतर स्टूडेंट तैयार करता है. इसलिए व्यापक सुधार के लिए शिक्षक प्रशिक्षण और सभी शिक्षा कार्यक्रमों को विश्वविद्यालयों या कॉलेजों के स्तर पर शामिल करने की सिफारिश की गई है.

सरकार अब न्यू नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क तैयार करेगी. इसमें ईसीई, स्कूल, टीचर्स और एडल्ट एजुकेशन को जोड़ा जाएगा. बोर्ड एग्जाम को भाग में बांटा जाएगा. अब दो बोर्ड परीक्षाओं को तनाव को कम करने के लिए बोर्ड तीन बार भी परीक्षा करा सकता है.

इसके अलावा अब बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में लाइफ स्किल्स को जोड़ा जाएगा.जैसे कि आपने अगर स्कूल में कुछ रोजगारपरक सीखा है तो इसे आपके रिपोर्ट कार्ड में जगह मिलेगी. जिससे बच्चों में लाइफ स्किल्स का भी विकास हो सकेगा. अभी तक रिपोर्ट कार्ड में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था.

सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक हर बच्चे के लिए शिक्षा सुनिश्चित की जाए. इसके लिए एनरोलमेंट को 100 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है. इसके अलावा स्कूली शिक्षा के निकलने के बाद हर बच्चे के पास लाइफ स्किल भी होगी. जिससे वो जिस क्षेत्र में काम शुरू करना चाहे, तो वो आसानी से कर सकता है.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए कॉमन एंट्रेंस एग्जाम का ऑफर दिया जाएगा. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (National Education Policy, NEP) को अब देश भर के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिए एडिशनल चार्ज दिया जाएगा. जिसमें वह हायर एजुकेशन के लिए आम यानी कॉमन एंट्रेंस परीक्षा का आयोजन कर सकता है.

NTA पहले से ही ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम JEE Main, मेडिकल प्रवेश परीक्षा - NEET, UGC NET, दिल्ली विश्वविद्यालय (DUET), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNUEE) जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है.

पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान पद्धतियों को शामिल करने, 'राष्ट्रीय शिक्षा आयोग' का गठन करने और प्राइवेट स्कूलों को मनमाने तरीके से फीस बढ़ाने से रोकने की सिफारिश की गई है. ये राष्ट्रीय श‍िक्षा आयोग भारत की प्राचीन ज्ञान पद्धतियों को समग्रता के साथ श‍िक्षा से जोड़ने का काम करेगा.

रिसर्च में जाने वालों के लिए भी नई व्यवस्था की गई है. उनके लिए 4 साल के डिग्री प्रोग्राम का विकल्प दिया जाएगा. यानी तीन साल डिग्री के साथ एक साल एमए करके एम फिल की जरूरत नहीं होगी. इसके बाद सीधे पीएचडी में जा सकते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि सरकार ने नई श‍िक्षा नीति में अब एमफिल को पूरी तरह खत्म करने की बात कही है.

मल्टीपल डिसिप्लनरी एजुकेशन में अब आप किसी एक स्ट्रीम के अलावा दूसरा सब्जेक्ट भी ले सकते हैं. यानी अगर आप इंजीनियरिंग कर रहे हैं और आपको म्यूजिक का भी शौक है तो आप उस विषय को भी साथ में पढ़ सकते हैं. अब स्ट्रीम के अनुसार सब्जेक्ट लेने पर जोर नहीं होगा. पहले जैसे स्ट्रीम के अनुसार सब्जेक्ट का चुनाव करना होता था, अब उसमें भी बदलाव आएगा.

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा में बहुभाषिकता को प्राथमिकता के साथ शामिल करने और ऐसे भाषा शिक्षकों की उपलब्धता को महत्व दिया दिया गया है जो बच्चों के घर की भाषा समझते हों. यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों में दिखाई देती है. इसलिए पहली से पांचवीं तक जहां तक संभव हो मातृभाषा का इस्तेमाल शिक्षण के माध्यम के रूप में किया जाए. जहां घर और स्कूल की भाषा अलग-अलग है, वहां दो भाषाओं के इस्तेमाल का सुझाव दिया गया है.

लड़कियों की शिक्षा जारी रहे इसके लिए उनको भावनात्मक रूप से सुरक्षित वातावरण देने का सुझाव दिया गया है. इसके लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का विस्तार 12वीं तक करने का सुझाव नई शिक्षा नीति-2019 में है.

U.S. की NSF (नेशनल साइंस फाउंडेशन) की तर्ज पर सरकार NRF (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) ला रही है. इसमें न केवल साइंस बल्कि सोशल साइंस भी शामिल होगा. ये बड़े प्रोजेक्ट्स की फाइनेंसिंग करेगा. ये शिक्षा के साथ रिसर्च में युवाओं को आगे आने में मदद करेगा.

पहली व दूसरी कक्षा में भाषा व गणित पर काम करने पर जोर देने की बात नई शिक्षा नीति में शामिल है. इसके साथ ही चौथी व पांचवीं के बच्चों के साथ लेखन कौशल पर काम करने पर भी ध्यान देने की बात कही गई है. इसके  लिए भाषा सप्ताह, गणित सप्ताह व भाषा मेला या गणित मेला जैसे आयोजन होंगे.

इसमें पुस्तकालयों को जीवंत बनाने और अन्य एक्ट‍िविटी को कराने पर ध्यान देने की बात कही गई है. जैसे बच्चे स्टोरी टेलिंग, रंगमंच, ग्रुप स्टडी, पोस्टर और डिस्प्ले से भी सीखें. बच्चों को किताबों के अलावा दूसरे माध्यमों से सिखाने पर जोर है, ये बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के उद्देश्य से भी जरूरी माना गया है.

अर्ली चाइल्डहुड केयर एवं एजुकेशन के लिए करिकुलम एनसीईआरटी द्वारा तैयार होगा. इसे 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए डेव‍लप किया जाएगा. इसमें बुनियादी शिक्षा (6 से 9 वर्ष के लिए) के लिए फाउंडेशनल लिट्रेसी एवं न्यूमेरेसी पर नेशनल मिशन शुरू किया जाएगा.

इसके लिए राष्ट्रीय श‍िक्षा नीति में गिफ्टेड चिल्ड्रेन एवं गर्ल चाइल्ड के लिए विशेष प्रावधान किया गया है. इसके अलावा पॉलिसी में कक्षा 6 के बाद से ही वोकेशनल स्टडी को जोड़ा जाएगा.

शिक्षकों के सपोर्ट के लिए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की बात भी नई शिक्षा नीति में शामिल है. इसके लिए कंप्यूटर, लैपटॉप व फोन इत्यादि के जरिए विभिन्न ऐप का इस्तेमाल करके शिक्षण को रोचक बनाने की बात कही गई है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की परिभाषा बदल दी गई है. इसमें निवेश की लिमिट में बदलाव किया गया है. 1 करोड़ निवेश या 10 करोड़ टर्नओवर पर सूक्ष्म उद्योग का दर्जा दिया जाएगा.

इसी तरह 10 करोड़ निवेश या 50 करोड़ टर्नओवर पर लघु उद्योग का दर्जा दिया जाएगा. वहीं 20 करोड़ निवेश या 100 करोड़ टर्नओवर पर मध्यम उद्योग का दर्जा होगा.निर्मला सीतारमण ने बताया कि मौजूदा दौर में ट्रेड फेयर संभव नहीं है.

200 करोड़ तक का टेंडर ग्‍लोबल नहीं होगा. यह एमएसएमई के लिए बड़ा कदम है. इसके अलावा एमएसएमई को ई-मार्केट से जोड़ा जाएगा. सरकार एमएसएमई के बाकी पेंमेंट 45 दिनों के अंदर करेगी.

वित्त मंत्री के मुताबिक 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में से 3 लाख करोड़ एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को जाएंगे. इनको बिना गारंटी लोन मिलेगा. इसकी समयसीमा 4 साल की होगी. इन्‍हें 12 महीने की छूट मिलेगी. ये ऑफर 31 अक्‍टूबर 2020 तक के लिए है.

केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो समूहों – जिसमें चरमपंथी गुट नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB) के सभी गुट शामिल हैं – ने शांति और विकास के लिए बोडोलैंड समझौते पर हस्ताक्षर किए। 

फिलहाल क्या समझौता हुआ है?

बोडोलैंड को अब तक आधिकारिक तौर पर बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) कहा जाता है। नए समझौते के लागू होने के बाद इसका नाम बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) हो जाएगा। बीटीआर को अधिक अधिकार दिए जाएंगे। बीटीसी की मौजूजा 40 सीटों को बढ़ाकर 60 कर दिया जाएगा और इलाके में कई नए जिलों का गठन होगा। गृह विभाग को छोड़ अन्य विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार बीटीआर के पास रहेंगे।

समझौते में कहा गया है, “असम राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखते हुए उनकी मांगों के लिए एक व्यापक और अंतिम समाधान के लिए बोडो संगठनों के साथ बातचीत की गई।”

बीटीसी क्या थी ?यह संविधान की छठी अनुसूची के तहत एक स्वायत्त निकाय थी। पहले दो बोडो समझौते हुए हैं। दूसरे समझौते के बाद बीटीसी का गठन हुआ। 1987 से ABSU के नेतृत्व वाला जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह 1993 में बोडो समझौते के बाद समाप्त हुआ। इस समझौते ने बोडोलैंड स्वायत्त परिषद (BAC) का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन ABSU ने अपना समझौता वापस ले लिया और एक अलग राज्य की अपनी मांग शुरू की। 2003 में दूसरे बोडो समझौते पर चरमपंथी समूह बोडो लिबरेशन टाइगर फोर्स (BLTF), केंद्र सरकार और राज्य ने हस्ताक्षर किए थे। इसके चलते बीटीसी हुई थी।

बोडो मुद्दे का इतिहास

असम में अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों में बोडो एक बड़ा समुदाय है। असम की आबादी का 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा बोडो का है। बोडो राज्य बनाने की पहली संगठित मांग 1967-68 में असम के राजनीतिक दल प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल के बैनर तले की गई थी। 1985 में असम आंदोलन का समापन असम समझौते में हुआ। इस समझौते को बोडो समुदाय के कई लोगों ने असमिया भाषी समुदाय के हितों पर ध्यान केंद्रित करने के रूप में देखा।
1987 में उपेंद्र नाथ ब्रह्मा के नेतृत्व में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) ने बोडो राज्य की मांग को फिर से उठाया। अक्टूबर 1986 में रंजन दायमरी के नेतृत्व में सशस्त्र समूह बोडो सिक्योरिटी फोर्स का गठन हुआ। बाद में इसका नाम बदलकर एनडीएफबी कर दिया गया और बाद में यह कई गुटों में बंट गया।
27 जनवरी 2020 को केंद्र सरकार, असम सरकार और एनडीएफबी ने समझौते पर हस्ताक्षर किया। समझौते के ज्ञापन में कहा गया है, ” सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स के तहत सभी एनएफडीबी गुट हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे, अपने हथियार सरेंडर कर देंगे और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने के भीतर अपने हथियारबंद संगठनों को समाप्त कर देंगे।”

मिशन इंद्रधनुष अभियान को भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी बच्चों को टीकाकरण के अंतर्गत लाने के लिये "'मिशन इंद्रधनुष'" को सुशासन दिवस के अवसर पर 25 दिसंबर 2014 प्रारंभ किया गया था ' इंद्रधनुष के सात रंगों को प्रदर्शित करने वाला मिशन इंद्रधनुष का उद्देश्य उन बच्चों का 2020 तक टीकाकरण करना है जिन्हें टीके नहीं लगे हैं या डिफ्थेरिया, बलगम, टिटनस ,पोलियो, तपेदिक, खसरा तथा हेपिटाइटिस-बी को रोकने जैसे सात टीके आंशिक रूप  से लगे हैं।

पहले चरण में देश में 221 जिलों की पहचान की है, जिसमें 50 प्रतिशत बच्चों को टीके नहीं लगे हैं या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए हैं। इन जिलों को नियमित रूप से टीकाकरण की स्थिति सुधारने के लिए लक्ष्य बनाया जाएगा। मंत्रालय का कहना है कि 201 जिलों में से 82 जिले केवल चार राज्य-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान से हैं और चार राज्यों के 42 जिलों में 25 प्रतिशत बच्चों को टीके नहीं लगाए गए हैं या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए हैं।

 

भारत में टीकों से वंचित या आंशिक टीकाकरण वाले करीब 25 प्रतिशत बच्चे इन चार राज्यों के 82 जिलों में हैं। देश में नियमित टीकाकरण कवरेज में सुधार के लिए इन जिलों में गहन प्रयास किए जाएंगे। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में सभी बच्चों और गर्भवती महिलाओं को ऐसी बीमारियों से सुरक्षित करना है जिनसे बचाव संभव है।

विशेष ध्यान वाले क्षेत्र

मिशन इंद्रधनुष के तहत पहले चरण में 201 जिलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का लक्ष्य तय किया है तथा 2015 में दूसरे चरण में 297 जिलों को लक्ष्य बनाया गया है। मिशन के पहले चरण का कार्यान्वयन 201 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में 7 अप्रैल,2015 पर विश्व स्वास्थ्य दिवस से प्रारंभ हुआ।

वाली बस्तियों पर ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में भौगोलिक, जनांकिकीय, जातीय और संचालन संबंधी अन्य चुनौतियों के कारण कम टीके लगाए जा सके हैं। प्रमाणों से पता चलता है कि अधिकतर टीकाकरण से वंचित और आंशिक टीकाकृत बच्चे इन्हीं क्षेत्रों में हैं।

विशेष टीकाकरण अभियानों के जरिए निम्नलिखित क्षेत्रों को लक्ष्य बनाया जाएगा:

पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के जरिए उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की गई। इन क्षेत्रों में ऐसी आबादी रहती है

  1. प्रवासियों की शहरी झुग्गी बस्तियां

  2. घुमंतू प्रजातियां

  3. भट्टा मजदूर

  4. निर्माण स्थल

  5. अन्य प्रवासी ( मछुआरों के गांव, दूसरी जगह रहने वाली आबादी के नदी तटीय क्षेत्र इत्यादि) तथा

  6. अल्प सेवा पहुंच वाले और दूर दराज के क्षेत्र ( वन क्षेत्र में रहने वाली और आदिवासी आबादी इत्यादि)

  7. निम्न नियमित टीकाकरण वाले क्षेत्र (खसरे वाले क्षेत्र / टीका निवारक रोग प्रकोप वाले क्षेत्र)

  8. खाली पड़े उप-केंद्र वाले क्षेत्र: तीन महीनों से अधिक समय से कोई एएनएम तैनात नहीं

  9. नियमित टीकाकरण से अछूते रह गए क्षेत्र: एएनएम लंबी छुट्टी पर या ऐसा ही कोई अन्य कारण

  10. छोटे गांव, बस्तियों, आरआई सत्रों के लिए अन्य गांव के साथ जोड़े गए धनिस या पुरबास

रोगों की पहचान

मिशन इंद्रधनुष के लिए सात बीमारियों डिप्थीरिया, काली खांसी, टेटनस, पोलियो, टीबी (क्षय रोग), खसरा और हेपेटाइटिस-बी रोगों की पहचान की गई है।

कार्यक्रम के लक्ष्य

मंत्रालय का कहना है कि प्रतिवर्ष पांच प्रतिशत और उससे अधिक बच्चों को टीकाकरण कवरेज में शामिल करने की प्रक्रिया तेज करने के लिए तथा 2020 तक संपूर्ण कवरेज के लक्ष्य को हासिल करने के लिए मिशन को अपनाया गया है। योजना के अनुसार प्रणालीबद्ध टीकाकरण अभियान पुराने अभियान के जरिए चलाया जाएगा, जिसका लक्ष्य उन बच्चों को कवर करना है जो टीकाकरण से वंचित रह गए हैं। ऐसा लक्षित है कि मिशन इंद्रधनुष के अंतर्गत जनवरी तथा जून 2015 के बीच चार विशेष टीकाकरण अभियान चलाए जाएंगे। इसकी व्यापक नीति होगी और अभियानों की निगरानी की जाएगी। मिशन की नीति बनाने और उसे लागू करने में पोलियो कार्यक्रम के कार्यान्वयन की सफलता से सीख ली जाएगी। पहले चरण में 201 जिले कवर किए जाएंगे और 2015 में दूसरे चरण में 297 जिलों को लक्ष्य बनाया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने विभिन्न महत्वपूर्ण संगठनों को भी इसमें भागीदारी दी है निर्धारित है कि  विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोटरी इंटरनेशनल तथा अन्य दाता सहयोगी मंत्रालय को तकनीकी समर्थन देंगे। मास मीडिया, अंतर-वैयक्तिक संचार, निगरानी की मजबूत व्यवस्था, योजना मूल्यांकन मिशन इंद्रधनुष के महत्वपूर्ण घटक हैं।

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के सभी घरों तक बिजली पहुंचाने के लिए 'सौभाग्य' योजना की शुरुआत की है. नरेंद्र मोदी ने जनसंघ नेता दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर इस महत्वपूर्ण योजना की घोषणा की है. सौभाग्य का मतलब 'सहज बिजली हर घर योजना' है. इसके तहत साल 2019 तक हर गांव, हर शहर के हर घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. मोदी की मंशा है कि 31 मार्च 2019 तक इसे पूरा किया जाय.

इस योजना के तहत साल 2011 के सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना में दर्ज गरीबों को बिजली का कनेक्शन फ्री दिया जाएगा. जिन लोगों का नाम इस जनगणना में नहीं है वह भी 500 रुपये का भुगतान कर बिजली का कनेक्शन हासिल कर सकेंगे. इस राशि को 10 बराबर किस्तों में बिजली के बिलों के रूप में वसूला जाएगा.

सौभाग्य योजना के तहत सुदूर व दुर्गम क्षेत्रों में बिजली से वंचित लोगों को मोदी सरकार बैटरी बैंक उपलब्ध कराएगी. इसके तहत 200 से 300 डब्ल्यूपी का सोलर पावर पैक दिया जायेगा, जिसमें पांच एलईडी लाइट, एक पंखा, एक पावर प्लग काम कर पायेगा. इस पैक के लिए 5 साल की मेंटेनेंस की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. सौभाग्य योजना के तहत सबको बिजली उपलब्ध कराने की इस पहल में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान व पूर्वोत्तर राज्य शामिल हैं.

हर साल प्राकृतिक आपदा के चलते भारत में किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. बाढ़, आंधी, ओले और तेज बारिश से उनकी फसल खराब हो जाती है. उन्हें ऐसे संकट से राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) शुरू की है. इसे 13 जनवरी 2016 को शुरू किया गया था.

इसके तहत किसानों को खरीफ की फसल के लिये 2 फीसदी प्रीमियम और रबी की फसल के लिये 1.5% प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है.

PMFBY में प्राकृतिक आपदाओं के कारण खराब हुई फसल के मामले में बीमा प्रीमियम को बहुत कम रखा गया है. इससे PMFBY तक हर किसान की पहुंच बनाने में मदद मिली है.

PMFBY योजना वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिए भी बीमा सुरक्षा प्रदान करती है. इसमें हालांकि किसानों को 5% प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है.

भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी या AIC) इस योजना को चलाती है.

योजना के उद्देश्य

  1. प्राकृतिक आपदा, कीड़े और रोग की वजह से सरकार द्वारा अधिसूचित फसल में से किसी नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर और वित्तीय सहायता देना.

  2. किसानों की खेती में रुचि बनाये रखने के प्रयास एवं उन्हें स्थायी आमदनी उपलब्ध कराना.

  3. किसानों को कृषि में इन्नोवेशन एवं आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना.

  4. कृषि क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करना.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार, (1 फरवरी 2020) को प्रधानमंत्री कृषि ऊर्जा सुरक्षा उत्थान महाभियान (पीएम कुसुम) के विस्तार की घोषणा की। इस योजना के तहत 20 लाख किसानों को सोलर पंप लगाने में मदद की जाएगी।

वित्त मंत्री ने 2020-21 का बजट पेश करते हुए कहा कि 15 लाख किसानों को ग्रिड से जुड़े सोलर पंप लगाने के लिए धन मुहैया कराया जाएगा। किसान इन सोलर पंपों से बनने वाली अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति ग्रिड को भी कर सकेंगे। मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में फरवरी 2019 में पीएम कुसुम योजना की शुरुआत की थी, जिसके लिए 34,422 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। 

सीतारमण ने लोकसभा में कहा कि इस योजना से किसानों की डीजल और केरोसिन तेल पर निर्भरता घटी है और वे सौर ऊर्जा से जुड़े हैं। इस योजना से किसान सौर ऊर्जा उत्पादन करने और उसे ग्रिड को बेचने में सक्षम हुए हैं। उन्होंने कहा कि किसान अपनी बंजर जमीन पर सौर ऊर्जा पैदा कर आमदनी भी कमा सकेंगे। 

पीएम कुसुम योजना के तीन घटक हैं- 10,000 मेगावाट क्षमता के ग्रिड से जुड़े विकेंद्रीकृत नवीकरणीय बिजली संयंत्र, 17.50 लाख ग्रिड से पृथक सौर बिजली कृषि पंप और ग्रिड से जुड़े हुए 10 लाख सौर बिजली कृषि पंपों का सोलराइजेशन।

योजना के तहत इन तीनों घटकों को मिलाकर 2022 तक कुल 25,750 मेगावाट सौर क्षमता तैयार करने की योजना है। 

लगभग 25 साल पुराने ब्रू-शरणार्थियों के संकट का अंत हुआ है. समझौते के तहत अब उनके लिए गरिमापूर्ण जीवन जीने का रास्ते खुल गए हैं. 2020 का नया दशक ब्रू-शरणार्थियों समुदाय के जीवन में एक नई आशा और उम्मीद की किरण लेकर आया है.

करीब 34,000 ब्रू-शरणार्थियों को त्रिपुरा में बसाया जाएगा.

71वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के जरिए देश को संबोधित किया. उन्होंने कहा 'आज गणतंत्र-दिवस के पावन अवसर पर मुझे 'गगनयान' के बारे में बताते हुए खुशी हो रही है. 2022 में हमारी आजादी के 75 साल पूरे होने वाले हैं और उस मौके पर हमें 'गगनयान मिशन' के साथ एक भारतवासी को अंतरिक्ष में ले जाने के अपने संकल्प को सिद्ध करना है.'

पीएम ने आगे कहा कि 'गगनयान  मिशन' 21वीं सदी में साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगा. नए भारत के लिए ये एक 'मील का पत्थर' साबित होगा. पीएम ने कहा कि इस मिशन में Astronaut यानी अंतरिक्ष यात्री के लिए 4 उम्मीदवारों का चयन कर लिया गया है. ये चारों भारतीय वायुसेना के पायलट हैं.

भारतीय अंतरिक्ष यान कार्यक्रम गगनयान के अंतर्गत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ) अंतरिक्ष की स्थिति को बेहतर तरीके से समझने के लिए ह्यूमैनोयड मॉडल (मानव की तरह दिखने वाला ) भेजने की योजना बना रहा है. इस ह्यूमनॉयड को इसरो ने ‘व्योम मित्र’ नाम दिया है. बताया जा रहा है कि इसे 2022 में गगनयान मिशन से पहले रवाना किया जाएगा.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. सिवन ने बुधवार को कहा कि दिसंबर 2021 में भारत के प्रथम मानवयुक्त अंतरिक्षयान ‘गगनयान’ के प्रक्षेपण के मद्देनजर इसरो दिसंबर 2020 और जून 2021 में दो मानवरहित मिशनों का प्रक्षेपण करेगा. व्योममित्र उसी का हिस्सा है.

इसरो के वैज्ञानिक सैम दयाल ने कहा, यह एक इंसान की तरह काम करेगा और हमें वहां की जानकारियां मुहैया कराएगा. फिलहाल इसरो एक प्रयोग के रूप में इस व्योम मित्र का उपयोग कर रहा है.’

‘मानव अंतरिक्षयान और खोज: वर्तमान चुनौतियां तथा भविष्य घटनाक्रम’ पर विचार गोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सिवन ने कहा कि ‘गगनयान’ मिशन का उद्देश्य न केवल अंतरिक्ष में भारत का पहला मानवयान भेजना है, बल्कि ‘निरंतर अंतरिक्ष मानव उपस्थिति’ के लिए नया अंतरिक्ष केंद्र स्थापित करना भी है.

उन्होंने कहा, ‘हम तीन चरणों में यह सब कर रहे हैं. दिसंबर 2020 और जून 2021 में दो मानवरहित मिशन और उसके बाद दिसंबर 2021 में मानवयुक्त अंतरिक्ष यान.’

नए अंतरिक्ष केंद्र के संबंध में इसरो ने भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेंगलुरु के पास अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया है.

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी, नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों तथा उद्यमों से बात कर रही है कि कैसे वह मानवयुक्त अंतरिक्षयान पर साथ मिलकर काम कर सकती है और कैसे उनके अनुभव से सीखा जा सकता है.

‘गगनयान’ इसरो के अंतर-ग्रहीय मिशन के दीर्घकालिक लक्ष्य में भी मदद करेगा. इसरो प्रमुख ने कहा, ‘अंतर-ग्रहीय मिशन दीर्घकालिक एजेंडे में शामिल है.’

‘गगनयान’ मिशन पर सिवन ने कहा कि अंतरिक्ष एजेंसी ने महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों जैसे कि निचली कक्षा के लिए 10 टन की पेलोड क्षमता वाला संचालनात्मक लॉंचर पहले ही विकसित कर लिया है और इसका प्रदर्शन किया है.

उन्होंने कहा, ‘केवल मानव जीवन विज्ञान और जीवन रक्षा प्रणाली जैसे तत्व की कमी है जिसे अब हम विकसित कर रहे हैं.’

सिवन ने कहा कि इसरो ने ‘गगनयान’ कार्यक्रम के लिए कई राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, अकादमिक संस्थानों, डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, भारतीय वायुसेना, सीएसआईआर प्रयोगशालाओं को पक्षकार बनाया है.

सिवन ने कहा कि भारत में जल्द ही सामान्य रूप से अंतरिक्ष उड़ान प्रशिक्षण शुरू होगा. इसमें कई सिमुलेटर और अन्य उपकरणों के इस्तेमाल के साथ मिशन से जुड़ा विशिष्ट प्रशिक्षण दिया जाएगा.

पूर्व जनरल बिपिन रावत को भारत का पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) बनाया गया है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ; प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के लिए महत्वपूर्ण रक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर भारत सरकार के सलाहकार के रूप में कार्य करेगा. CDS; परमाणु मुद्दों पर प्रधानमंत्री के सैन्य सलाहकार के रूप में भी काम करेगा. सीडीएस का पद 'फोर स्टार' जनरल के समकक्ष होगा और सभी सेनाओं के प्रमुखों में सबसे ऊपर होगा जबकि रिटायरमेंट की उम्र 65 वर्ष होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान लालकिले की प्राचीर से जब थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल सुनिश्चित करने और उन्हें प्रभावी नेतृत्व देने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद का एलान किया था, तभी से सबकी निगाहें इस बात पर थीं कि इस पद पर पहला मौका किसे मिलेगा।

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पीछे का इतिहास (History behind the CDS post)

भारत में यह पहली बार नहीं है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) का पद सृजित हो रहा है. वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भी भारत में एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद को बनाने की पहल K. सुब्रह्मण्यम समिति की सिफारिस के आधार पर की गयी थी. लेकिन राजनीतिक असहमति और आशंकाओं के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी थी.

नरेश चंद्र समिति ने 2012 में चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (COSC) के एक स्थायी चेयरमैन की नियुक्ति की सिफारिश की थी और वर्तमान में यही काम कर रही है.

कौन है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ? (About Chief of Defence Staff)

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का मतलब होगा कि प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के लिए महत्वपूर्ण रक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर सरकार के सलाहकार के रूप में केवल एक व्यक्ति कार्य करेगा. सीडीएस परमाणु मुद्दों पर प्रधानमंत्री के सैन्य सलाहकार के रूप में भी काम करेगा.

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का कार्य होगा कि वह सेना के तीनों अंगों के बीच दीर्घकालिक नियोजन, प्रशिक्षण, खरीद और परिवहन के कार्यों के लिए समन्वयक (Coordinator) का कार्य करेगा.

जैसा कि हम जानते हैं कि रक्षा क्षेत्र का बजट बढ़ता जा रहा इसलिए संसाधनों पर तनाव साल दर साल बढ़ता जा रहा है. अब सीमित संसाधनों के उपयोग को सुनिश्चित करके तीनों सेना के अंगों के बीच समन्वय को बढ़ाना समय की आवश्यकता है.

यहां उल्लेख करने योग्य बात यह है कि सभी प्रमुख देशों, विशेष रूप से परमाणु हथियार संपन्न देशों में एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जरूर है.

CDS के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं (Functions of CDS)

CDS के चयन से पहले, तीनों सेना प्रमुखों में सबसे सीनियर चीफ ही, चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष (COSC) के रूप में कार्य करता था. COSC की भूमिका अतिरिक्त होती है और कार्यकाल बहुत छोटा रहता है. CDS के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं.

1. वह तीनों सेनाओं के मामलों पर रक्षा मंत्री के प्रधान सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे.
2. परमाणु कमान प्राधिकरण के सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे.
3. सीडीएस, किसी भी सैन्य कमांड का प्रयोग नहीं करेगा,और इस मामले में नियम पूर्ववत ही रहेंगे.
4. सीडीएस, रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद के सदस्य होंगे.
5. वह चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी अध्यक्ष होंगे.
6. सैन्य मामलों के विभाग के प्रमुख के रूप में भी कार्य करेंगे.

अतः भारत के पडोसी देशों की नीति को देखते भारतीय सेना के तीनों विंगों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद की शीघ्र आवश्यकता थी. उम्मीद है कि अब सीमित रक्षा संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा  और किसी भी युद्ध जैसी स्थिति के दौरान देश की सुरक्षा की जा सकेगी.

किन-किन देशों में चीफ़ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ (CDS) का पद होता है?

1. चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ; इटली: (The Chief of the Defence Staff)
इटली का चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, इटैलियन आर्म्ड फोर्सेज के सर्वोच्च पद को बताता है. यह पद 4 मई 1925 को बनाया गया था और पिएत्रो बडोग्लियो इस पर बैठने वाले पहले व्यक्ति थे जबकि वर्तमान में इस पद पर एयर स्क्वाड्रन जनरल एंज़ो वेकेइरेल्ली हैं.

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2. दा चीफ ऑफ़ स्टाफ ऑफ़ दा अर्मीज (C.E.M.A.), फ्रांस (The Chief of Staff of the Armies)
C.E.M.A; फ्रेंच गणराज्य की सेनाओं के कर्मचारी मुख्यालय का प्रमुख होता है. C.E.M.A. फ्रांसीसी सशस्त्र बलों के उपयोग के लिए जिम्मेदार प्रमुख वरिष्ठ सैन्य अधिकारी है. यह पद 28 अप्रैल 1948 को बनाया गया था और अभी यह पद जनरल फ्रांकोइस लेकोइंट्रे संभाल रहे हैं. यह देश के रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करता है.

3. दा चीफ ऑफ़ दा जनरल स्टाफ; चीन (The Chief of the General Staff; China)
चीफ ऑफ जनरल स्टाफ ताइवान में रिपब्लिक ऑफ चाइना सशस्त्र बलों का प्रमुख है. यह पद 23 मई 1946 को बनाया गया था और वर्तमान में यह जनरल शेन यी-मिंग के पास है. इस पद पर बैठने वाला व्यक्ति सीधे रक्षा मंत्री; को रिपोर्ट करता है.

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4. दा चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ, स्पेन (The Chief of the Defence Staff)

यह स्पेनिश सशस्त्र बलों में सर्वोच्च रैंकिंग वाला सैन्य अधिकारी है. यह; रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय रक्षा परिषद और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख सैन्य सलाहकार के तौर पर काम करता हैं.

5. दा चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ, यूनाइटेड किंगडम (The Chief of the Defence Staff)
जैसा कि हम जानते हैं कि भारत के ऊपर ब्रिटेन ने कई वर्षों तक शासन किया था और उनके शासन के चिन्ह आज भी भारत की कई संस्थाओं, मिलिट्री और पुलिस में मौजूद हैं.

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यूनाइटेड किंगडम में; दा चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ, ब्रिटिश सशस्त्र बलों का पेशेवर प्रमुख होता है. चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ; ब्रिटेन में रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री के लिए सबसे वरिष्ठ सैन्य सलाहकार भी होता है.

6. चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ, कनाडा (Chief of the Defence Staff)
चीफ ऑफ डिफेंस; स्टाफ कनाडाई सशस्त्र बलों का दूसरा सबसे वरिष्ठ सदस्य है. शीर्ष पद कमांडर-इन-चीफ के पास होता है.
सीडीएस का पद, कनाडाई सशस्त्र बलों की तीनों मुख्य शाखाओं में से एक वरिष्ठ सदस्य के पास होता है. वर्तमान में सीडीएस के पद पर जोनाथन वेंस (17 जुलाई 2015 से) हैं जो कि कमांडर-इन-चीफ को रिपोर्ट करते हैं.

7. चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ; जापान  (Chief of Staff, Joint Staff)

चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ; जापान में सर्वोच्च श्रेणी का सैन्य अधिकारी और जापान सेल्फ डिफेंस फोर्सेज (JSDF) के ऑपरेशनल अथॉरिटी (कमांड) का प्रमुख होता है.

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चीफ ऑफ स्टाफ; जापान सेल्फ डिफेंस फोर्सेस के सभी मामलों पर रक्षा मंत्री की सहायता करता है और प्रधानमंत्री के निर्देशों के साथ रक्षा मंत्री के आदेशों को क्रियान्वित करता है.

यह पद 1 जुलाई 1954 को बनाया गया था और जनरल काजी यामाजाकी वर्तमान चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ हैं जो कि रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करते हैं.

तो यह थी दुनिया के विभिन्न देशों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की सूची. इस पद को अलग अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. भारत में इस पद का सृजन यूनाइटेड किंगडम के पद से प्रेरित है. मुझे उम्मीद है कि भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का सृजन भारतीय रक्षा बलों की क्षमताओं को और मजबूत करेगा.

कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने ई-प्रशासन पहल के अधीन कई कदम उठाए हैं। इसका एक मात्र उद्देश्‍य हित धारकों की डाटाबेस तक पहुंच को सुविधा जनक बनाना है, जो उनके लिए अपना कारोबार और बढ़ाने के लिए अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण होगा। यह डाटाबेस खास कर हित धारकों द्वारा कारपोरेट जगत को स्‍वीकृत और जारी अग्रिम राशि के प्रति शुल्‍क के सृजन से संबंधित है। 

एमसीए और एमसीए-21 पोर्टल का पुनर्निर्माण

  • पुनर्निर्मित पोर्टल एमसीए-21 पहली बार खोलने वाले उपयोगकर्ता के लिए अधिक हितैषी और व्‍याख्‍यात्‍मक है।

  • पोर्टल एमसीए-21 का अत्‍यधिक प्रयोग में आने वाली कार्यात्मकताओं से सम्‍बन्धित अनुभागों को परिभाषित किया है और उपयोगकर्ता की सहायता के लिए विस्‍तृत उपाय-वार प्रक्रिया परिभाषित की गई है।

  • एमसीए-21 पोर्टल की कार्यात्‍मकताओं से सुपरिचित उपयोगकर्ताओं को सभी अनुभागों के अंदर त्‍वरित संपर्क प्रदान किया गया है।

  • निवेशकों के हितों की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए 'निवेशक सेवा' नामक एक विशेष व्‍यवस्‍था भी की गई है।

  • इस व्‍यवस्‍था में निवेश शिक्षा संरक्षण कोष (आईईपीएफ) जैसी सभी सम्‍बद्ध वेबसाइटों के साथ संपर्क है, जो निवेशकों के हितों की सुरक्षा में सहायता करता है।

समूचे भारत के लिए इलेक्‍ट्रोनिक स्‍टैम्पिंग का अधिदेश

  • एमसीए-21 प्रणाली के जरिये ई-स्‍टैम्पिंग की व्‍यवस्‍था सभी राज्‍यों और संघ शासित प्रदेशों के लिए अधिदेश कर दी गई है।

प्रकिया द्वारा सीधे (एसटीपी) मोड के अधीन विशिष्‍ट ई-फॉर्मों को संसाधित करना। यह कंपनी रजिस्‍ट्रार के उपयोगिता द्वारा संसाधित नहीं किया जाएगा।

  • शेयरों के आबंटन की वापसी से संबंधित फॉर्म-2 और फॉर्म-3

  • किसी मौजूदा कंपनी द्वारा पंजीकृत कार्यालय में परिवर्तन के लिए फॉर्म-18

  • किसी मौजूदा कंपनी द्वारा निदेशक आदि में परिवर्तन संबंधी ब्‍योरे के लिए फॉर्म-32

  • शुल्‍क (देरी के लिए क्षमा को छोड़कर अन्‍य मामले) के संबंध में फॉर्म-8 और 17

  • किसी नयी कंपनी द्वारा नाम उपलब्‍ध कराने के लिए फॉर्म-1ए (इसमें नाम उपलब्‍ध कराने से सम्‍बन्धित दिशा-निर्देश भी शामिल हैं)

  • विशिष्‍ट कंपनियों को निष्क्रिय कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक  लगाना

  • जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और बेलेंसशीट लगातार तीन वर्ष तक जमा नहीं कराई उन कंपनियों को एक अलग वर्ग-डोरमेंट (निष्क्रिय) कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों को अपना ई-फाइलिंग जमा करने से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे फाइलिंग में दोष को दूर नहीं कर लेतीं।

विशिष्‍ट कंपनियों को दोषी कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक लगाना

  • जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और/या बेलेंस‍शीट एक वर्ष या अधिक अवधि के लिए जमा नहीं की उन्‍हें दोषी कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों और उनके निदेशकों को ई-फाइलिंग से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे रिटर्न फाइल करने में दोष को दूर नहीं कर लेते।

शिकायत पर नजर रखने की विस्‍तृत व्‍यवस्‍था का कार्यान्‍वयन

  • एमसीए-21 हित धारकों के लिए एमसीए-21 प्रणाली में शिकायत पर नजर रखने की एक विस्‍तृत प्रणाली लागू की गई है। उपयोगकर्ता उसी के जरिये शिकायतें, मामले, प्रश्‍न, सुझाव दे सकते हैं और उन्‍हें उसके लिए एक विशिष्‍ट संदर्भ टिकट दिया जाता है। वे संदर्भ टिकट का प्रयोग करके शिकायत की पूर्ति की स्थिति जान सकते हैं।

प्रणाली के अधीन प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर

  • पहले की व्‍यवस्‍था के अनुसार कंपनी रजिस्‍ट्रार के अधिकारी विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर हस्‍ताक्षर करके उसे कंपनी को डाक द्वारा भेजते थे। अब एमसीए-21 प्रणाली के अधीन विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसमें अब हाथ से कोई काम नहीं किया जाता और फिर डिजिटल तरीके से हस्‍ताक्षरित प्रमाण पत्रों को ई-मेल के जरिये कंपनी को भेजा जाता है और पुष्टि के लिए एमसीए-21 एफओ पोर्टल को भी उपलब्‍ध कराया जाता है।

डायरेक्‍टर आइडेंटिफिकेशन नम्‍बर (डीआईएन) के आबंटन की प्रक्रिया को कागज-मुक्‍त और ऑन-लाइन बनाया गया, और डीआईएन-डीपीआईएन को जोड़ा गया

  • एमसीए द्वारा डीआईएन के आबंटन की प्रक्रिया को पूरी तरह कागज-मुक्‍त बना दिया गया है। यह स्‍थूल रूप में सबूत दाखिल करने की आवश्‍यकता को समाप्‍त करने के लिए किया गया है और इसके स्‍थान पर इसे स्‍वयं डीआईएन आवेदन को स्‍कैन किया जा सकता है। इसके अलावा सभी भारतीय निदेशकों के लिए आयकर पैन उपलब्‍ध करना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही कार्यरत व्यवसायी के प्रमाण पत्र पर आधारित व्‍यवस्‍था द्वारा डीआईएन आवेदन-पत्र को संसाधित किया जाता है।

  • कंपनी अधिनियम के अधीन डीआईएन के आबंटन और एलएलपी अधिनियम के तहत डीपीआईएन के आबंटन के लिए एमसीए के पास अलग- अलग व्‍यवस्‍थाएं हैं। अब एमसीए ने दोनों व्‍यवस्‍थाओं को जोड़ कर डीआईएन के रूप में एक-समान पहचान बना दी है।

अन्य सरकारी विभागों के साथ समन्वय-आयकर और ट्रेडमार्क
संयुक्त सेवाओं के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में विभिन्न विभागों के साथ समन्वय किया गया-

  • निदेशकों आदि के विवरणों का सत्यापन करने के लिए आयकर प्रणाली के साथ उनके अपने-अपने आयकर पैन ब्यौरे को जोड़ना।

  • आंतरिक (कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालय) और बाहरी हितधारकों (कंपनी, व्यावसायी) के टीएमआर डाटा बेस पर ढूंढने की सुविधा प्रदान करने के लिए ट्रेडमार्क प्रणाली के साथ जोड़ना।

कारपोरेट खाते खोलने के लिए बैंकों के साथ समन्वय

  • विभिन्न बैंकों के साथ समन्वय की प्रक्रिया में एमसीए ने कारपोरेटों के लिए एमसीए-21 प्रणाली के जरिये बैंक खाता खोलने के लिए एक सुविधा शुरू की है। कंपनी को एमसी प्रणाली पर इलैक्ट्रोनिक फार्म और कुछ ब्यौरे भरने होते हैं, कंपनी के बारे में दस्तावेज संबद्ध बैंक को एमसीए -21 प्रणाली के जरिये भेजें जाते हैं।

अदायगियां करने के लिए एनईएफटी विकल्प की शुरूआत

  • पहले एमसीए-21 अदायगियां क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और स्थूल चालान के जरिये करने की अनुमति थी। इंटरनेट बैंकिंग केवल पांच बैंकों तक सीमित है। अदायगी प्रक्रिया में होने वाली देरी से उत्पन्न असुविधा को समाप्त करने के लिए एमसीए ने एमसीए फीस की अदायगी एनईएफटी अर्थात राष्ट्रीय इलैक्ट्रोनिक कोष हस्तांतरण मोड के जरिये शुरू किया है। इस विकल्प के जरिये हितधारक एससीए-21 फीस की अदायगी किसी भी बैंक के जरिये, जो एनईएफटी की अनुमति देता हो, कर सकते हैं।

स्थूल चालान मोड के जरिये अदायगी पर रोक

  • स्कूल विकल्प (बैंक की खिड़की पर चालान के जरिये अदायगी) के जरिये एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं के लिए अदायगी की सुविधा पर, पचास हजार रुपये के समकक्ष अथवा उससे अधिक राशि के मामले में रोक लगा दी गई है।

विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करने के लिए एक्सबीआरएल लागू-

  • विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा एक्सटेंसीबल बिजनेस रिपोर्टिंग लैंग्वेज (एक्सबीआरएल) द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करना एमसीए-21 प्रणाली में कार्यान्वित किया गया है। इस प्रणाली में वित्तीय विवरणों को एमसीए एक्सबीआरएल टेक्सोनोमी के साथ जोड़ना होता है। एमसीए-21 प्रणाली ने हितधारकों को एक्सबीआरएल दस्तावेज दाखिल करने से पहले सत्यापित करने के लिए एक सुविधा प्रदान की है। इसके अतिरिक्त एक्सबीआरएल दस्तावेजों को पढ़ने वाली मशीन एमसीए -21 प्रणाली के जरिये दस्तावेजों को मनुष्य द्वारा पढ़े जाने योग्य बना देती है।

त्वरित कार्यात्मकता का चिन्ह

  • पहले एमसीए प्रयोगकर्ता द्वारा किसी कार्य वस्तु को संसाधित करने में उस कार्य वस्तु को तात्कालिक चिन्हित करने की सुविधा थी और वह इसे एफआईएफओ प्रक्रिया द्वारा करता था। तथापि अधिक पारदर्शिता लाने के लिए यह कार्यात्मकता रोक दी गयी है। अब कार्य वस्तु उनके द्वारा भरे जाने के क्रम से संसाधित की जाए

वापसी प्रक्रिया की शुरूआत

  • किसी हितधारक द्वारा एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं का लाभ उठाने के लिए गलती से दी गई फीस की वापसी के लिए एमसीए-21 में पहले कोई व्यवस्था नहीं की। मंत्रालय ने अब विशिष्ट सेवाओं के लिए अदा की गई वैधानिक फीस को वापस करने का निर्णय लिया है। हितधारक द्वारा रिफंड के लिए नया ई-फार्म भरना होगा  और उनकी संसाधित होने पर रिफंड का अनुरोध स्वीकार या अस्वीकार किया जाएगा।

  • एमसीए -21 की फीस का रिफंड जिन मामलों में उपलब्ध है वे हैं : (क) बहुअदायगियां का फार्म एक और पांच (ख) गलत अदागियां और (ग) ज्यादा अदायगी।

  • रिफंड प्रक्रिया विशिष्ट सेवाओं/ई फार्म जैसे दस्तावेजों का सार्वजनिक निरीक्षण, सत्यापित प्रतियों का अनुरोध हस्तांतरण दस्तावेजों के लिए अदायगी, स्टाम्प ड्यूटी फीस (डी श्रंखला एसआरएन), आईईपीएफ अदायगी, एसटीपी फार्म, डीआईएन ई फार्म आदि पर लागू नहीं होती।

स्वीडन की रहने वाली 16 वर्षीय ग्रेटा टुनबर्ग के ‘फ्राइडे फॉर फ्यूचर’ अभियान के पक्ष में लाखों लोग आ चुके हैं। वह तब चर्चा में आई थीं जब अगस्त, 2018 में हर शुक्रवार स्वीडन की संसद के बाहर धरना देना शुरू कर दिया था। वह हाथों में एक तख्ती लेकर वहां रहती थीं, जिस पर लिखा होता था जलवायु की खातिर स्कूल की हड़ताल। 

ग्रेटा टुनबर्ग पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की आइकॉन बन गई हैं. 16 साल की टुनबर्ग के नेतृत्व में 150 से अधिक देशों में हजारों लाखों बच्चों ने सड़क पर उतरकर जलवायु परिवर्तन की नजरअंदाजी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. स्वीडन की टुनबर्ग ने साल भर पहले जलवायु परिवर्तन की लड़ाई अकेले शुरू की थी. ‘फ्राइडे फॉर फ्यूचर’ नाम से शुरू मुहीम में उनके साथ लाखों पर्यावरण प्रेमी जुड़ चुके हैं.

जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा टुनबर्ग ने मंगलवार (29/10/2019) को एक पर्यावरण पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु अभियान में आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता में बैठे लोग पुरस्कार देने के बजाए विज्ञान का अनुसरण प्रारंभ करें।  अंतर संसदीय सहयोग के लिए क्षेत्रीय संस्था नॉर्डिक परिषद की ओर से स्टॉकहोम में आयोजित समारोह में ग्रेटा टुनबर्ग को इस सम्मान के लिए चुना गया। ग्रेटा टुनबर्ग के प्रयासों के लिए उन्हें स्वीडन और नॉर्वे दोनों की ओर से नामित किया गया था। उन्होंने संगठन का सालाना पर्यावरण पुरस्कार जीता था।

पुरस्कार की घोषणा के बाद थनबर्ग के एक प्रतिनिधि ने दर्शकों को बताया कि वह यह पुरस्कार और 52,000 डॉलर (36, 85,917 रुपये) की राशि स्वीकार नहीं करेंगी। उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने इस फैसले को साझा किया।

ग्रेटा टुनबर्ग ने यह सम्मान देने के लिए नॉर्डिक परिषद का आभार व्यक्त किया, लेकिन जलवायु से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात पर कायम नहीं रहने के लिए नॉर्डिक देशों की आलोचना भी की। एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि जलवायु अभियान को और पुरस्कारों की आवश्यकता नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सत्ता में बैठे लोग वर्तमान में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ विज्ञान का अनुसरण करना शुरू कर दें।

यूरोपीय संघ (EU) प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर दौरे को लेकर यूरोप के एक गैर सरकारी संगठन (NGO) का  नाम सुर्खियों में है. कथित तौर पर वूमेन’स इकोनॉमिक एंड सोशल थिंक टैंक (WESTT) नाम के NGO ने इस अनौपचारिक दौरे के लिए इंतजाम किए. WESTT छह साल पुराना एनजीओ है जिसे 19 सितंबर 2013 को रजिस्टर्ड किया गया. ‘थिंक टैंक एंड रिसर्च इंस्टीट्यूशन्स’ की EU रजिस्ट्रेशन कैटेगरी की धारा 4 के तहत ये रजिस्ट्रेशन हुआ. सोशल मीडिया की अटकलों के विपरीत WESTT को किसी सरकारी संस्था (भारतीय या यूरोपीय) से फंडिंग के तौर पर मोटी रकम नहीं मिली. EU रिकॉर्ड्स के मुताबिक एनजीओ को बीते वित्त वर्ष में कुल 24,000 पौंड (करीब 18,83,376 रुपये) का कुल फंड मिला. WESTT को ये फंड सालाना डोनेशन के तौर पर मिला. EU रिकॉर्ड्स से ये भी संकेत मिला कि एनजीओ को पूरे साल में एक ही डोनर मिला.

WESTT एनजीओ दरअसल यूनाइटेड किंगडम स्थित माडी ग्रुप की कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी गतिविधि है.

माडी ग्रुप के जरिए WESTT को यूनाइटेड किंगडम स्थित उद्यमी माडी शर्मा उर्फ मधु शर्मा संचालित करती हैं. एनजीओ के दावे के मुताबिक कम से कम 14 देशों में उसके सदस्य या प्रतिनिधि मौजूद हैं. ये देश हैं- बेल्जियम, क्रोएशिया, फ्रांस, लिथुआनिया, पोलैंड, यूनाइटेड किंगडम, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, भारत, नेपाल, नॉर्थ मेसेडोनिया, पाकिस्तान और तुर्की.

रिकॉर्ड्स के मुताबिक संगठन के पास कामकाज के लिए 5 लोगों की टीम है. इनमें से सिर्फ एक शख्स ही पूर्णकालिक है बाकी सभी सदस्य वॉलन्टियर आधार पर विश्व के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे हैं.

माडी ग्रुप की आधिकारिक वेबसाइट में इस ग्रुप में “I3I” नाम की बिजनेस ब्रोकरेज कंपनी को भी शामिल बताया गया है, जो ग्लोबल कॉरपोरेट कंपनियों के लिए बिजनेस टू बिजनेस या सरकार से संपर्क का दावा करती है. ये संपर्क परिचय, इंटेलीजेंस या इनोवेशन के जरिए कराया जाता है.

कॉरपोरेट फाइलिंग्स के मुताबिक यूनाइटेड किंगडम स्थित ‘I3I यूके लिमिटेड’ को एजाज अकबर नाम के भारतीय डायरेक्टर संचालित करते हैं. माडी ग्रुप की ‘माडी मैग्नीशियम’ के नाम से एक कंसल्टेंसी फर्म भी है. इसके अलावा ग्रुप की एक आयात/निर्यात कंपनी, एक टूर कंपनी और एक बैक ऑफिस रिसोर्स सॉल्यूशन कंपनी भी है. ग्रुप की ओर से ‘एक्स्ट्राऑर्डनरी एजुकेशन’ नाम से गैर मुनाफा आधार पर एक और संगठन चलाया जाता है जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है.

यह जगह सीरिया में हैं। इसका नाम है बारिशा। यह एक गांव है जो तुर्की की सीमा से कोई दस किमी की दूरी पर था। वहीं सीरिया की राजधानी अलेप्‍पो से इसकी दूरी करीब 90 किमी थी। अलेप्‍पो से यदि सड़क से यह दूरी तय की जाए तो करीब दो घंटे का समय लगता है। वहीं सीरिया के ही इदलिब से यह 32 किमी की दूरी पर स्थित है। बगदादी की मौत के बाद यह पूरा इलाका सुर्खियों में आ गया है। 

बारिशा गांव (Barisha or Baricha Village) हरेम जिले में आता है जिस पर सीरिया के इदलिब प्रांत (Idlib Government) की हुकूमत चलती है। बारिशा अ'ला' पहाडि़यों (A'La' Mountain) के बीच बसा एक छोटा सा गांव है। आपको जानकर हैरत होगी कि यहां फैली खामोशी की बदौलत इस इलाके को मृत शहर या डेड सिटी (Dead Cities) भी कहा जाता है। सीरिया के सेंट्रल ब्‍यूरो ऑफ स्‍टेटिस्‍टक्‍स (Syria Central Bureau of Statistics) के आंकड़ों के मुताबिक 2004 में इसकी आबादी महज 1143 थी। आपको बता दें कि यह गांव सीरिया के उस प्राचीन इतिहास का हिस्‍सा है जिसका संबंध बीजांटिन पीरियड (Byzantine period) से है। यह रोमन साम्राज्‍य की याद दिलाता है। इस काल के यहां पर अब भी कई अवशेष मौजूद हैं।  

इस पूरे इलाके की खासियत है कि यहां पर छोटी-छोटी कई गुफाएं मौजूद हैं, जो बेहद प्राचीन हैं। यही वह है कि बगदादी अपने छिपने के लिए मुफीद जगह मानता था। इसके अलावा यहां पर कई सुरंग भी हैं जो आतंकियों ने अपने लिए तैयार की हुई हैं। यह इलाका आईएस का गढ़ होने के साथ आतंकियों को ट्रेनिंग वाला इलाका भी था। यहां से ही आईएस के आतंकी तैयार होकर दूसरी जगहों पर भेजे जाते थे और वो अपने खूनी खेल को अंजाम देते थे।  

आयुष्मान भारत योजना (ABY) की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2018 में की थी। इसे पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया है. आयुष्मान भारत योजना (ABY) को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) भी कहा जाता है. यह वास्तव में देश के गरीब लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम है. PMJAY के तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मिल रहा है. सरकार ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना चाहती है. आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए परिवार के आकार और उम्र का कोई बंधन नहीं है.

आयुष्मान भारत योजना के तहत स्वास्थ्य बीमा का लाभ लेने वालों की संख्या 20 लाख के पार निकल गयी है। कुल मिलाकर अब तक 3.07 करोड़ लाभार्थियों को योजना के तहत ई-कार्ड जारी किये गये हैं। योजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2018 में की थी। इसमें 10.74 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है। योजना के तहत 15,400 अस्पताल को जोड़ा गया है। इसमें से 50 प्रतिशत निजी अस्पताल हैं।

सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) 2011 के हिसाब से ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ परिवार और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत योजना (ABY) के दायरे में आयेंगे. इस तरह PM-JAY के दायरे में 50 करोड़ लोग आएंगे. 

साल 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लांच राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (NHBY) को भी आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) में मिला दिया गया है.

ABY की योग्यता का निर्धारण कैसे होता है?

SECC के आंकड़ों के हिसाब से आयुष्मान भारत योजना (ABY) में लोगों को मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. SECC के आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण इलाके की आबादी में D1, D2, D3, D4, D5 और D7 कैटेगरी के लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल किये गए हैं. 

शहरी इलाके में 11 पूर्व निर्धारित पेशे/कामकाज के हिसाब से लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो सकते हैं. राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में पहले से शामिल लोग खुद ही आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो गए हैं.

ग्रामीण इलाके के लिए ABY की योग्यता 

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: 

  • ग्रामीण इलाके में कच्चा मकान, परिवार में किसी व्यस्क (16-59 साल) का नहीं होना, परिवार की मुखिया महिला हो, परिवार में कोई दिव्यांग हो, अनुसूचित जाति/जनजाति से हों और भूमिहीन व्यक्ति/दिहाड़ी मजदूर

  • इसके अलावा ग्रामीण इलाके के बेघर व्यक्ति, निराश्रित, दान या भीख मांगने वाले, आदिवासी और क़ानूनी रूप से मुक्त बंधुआ आदि खुद आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो जायेंगे.

शहरी इलाके के लिए ABY की योग्यता

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: भिखारी, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, मोची, फेरी वाले, सड़क पर कामकाज करने वाले अन्य व्यक्ति. कंस्ट्रक्शन साईट पर काम करने वाले मजदूर, प्लंबर, राजमिस्त्री, मजदूर, पेंटर, वेल्डर, सिक्योरिटी गार्ड, कुली और भार ढोने वाले अन्य कामकाजी व्यक्ति स्वीपर, सफाई कर्मी, घरेलू काम करने वाले, हेंडीक्राफ्ट का काम करने वाले लोग, टेलर, ड्राईवर, रिक्शा चालक, दुकान पर काम करने वाले लोग आदि आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होंगे.

ABY में अस्पताल में भर्ती की प्रक्रिया

आयुष्मान भारत योजना (ABY) का लाभार्थी अस्पताल में एडमिट होने के लिए कोई चार्ज नहीं चुकाएगा. अस्पताल में दाखिल होने से लेकर इलाज तक का सारा खर्च इस योजना में कवर किया जायेगा. आयुष्मान भारत योजना (ABY) के लाभ में अस्पताल में दाखिल होने से पहले और बाद के खर्च भी कवर किये जायेंगे. पैनल में शामिल हर अस्पताल में एक आयुष्मान मित्र होगा. वह मरीज की मदद करेगा और उसे अस्पताल की सुविधाएं दिलाने में मदद करेगा. अस्पताल में एक हेल्प डेस्क भी होगा जो दस्तावेज चेक करने, स्कीम में नामांकन के लिए वेरिफिकेशन में मदद करेगा. आयुष्मान भारत योजना में शामिल व्यक्ति देश के किसी भी सरकारी/पैनल में शामिल निजी अस्पताल में इलाज करा सकेगा.

आज 27 मार्च को भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल किया है. हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर Low Earth Orbit (LEO) में एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया है. यह सैटेलाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, एसेट मिसाइल द्वारा मार गिराया गया. 'मिशन शक्ति' को तीन मिनट में सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया. यह अत्यंत कठिन ऑपरेशन था. इसमें उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक की जरूरत थी. सभी निर्धारित उद्देश्य प्राप्त कर लिए गए. यह भारत में एंटी सैटेलाइट (ए-सेट) मिसाइल द्वारा सिद्ध किया गया.

 भारत ने अंतरिक्ष में एक और कामयाबी का परचम लहराया है और मिशन शक्ति (Mission Shakti) की सफलता के साथ अमेरिका, चीन, रूस के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने देश के नाम संबोधन में इस बात की जानकारी दी. पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान कहा कि भारत अंतरिक्ष पावर के रूप में दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है.

अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों और जिम्मेदार देश होने के कारण भारत ने पहले इस क्षमता को हासिल होने के बारे में कोई पुष्टि नहीं की थी। लेकिन वर्तमान में बढ़ते सामरिक खतरों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज इस मिसाइल के सफल परीक्षण के साथ इस बात की घोषणा कर दी कि भारत भी इस प्रकार के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है।

चीन ने भारत के उपग्रह रोधी मिसाइल परीक्षण पर सतर्कतापूर्वक प्रतिक्रिया जताते हुए उम्मीद जतायी कि सभी देश बाहरी अंतरिक्ष में शांति बनाये रखेंगे। चीन ने ऐसा एक परीक्षण जनवरी 2007 में किया था जब उसके उपग्रह रोधी मिसाइल ने एक निष्क्रिय मौसम उपग्रह को नष्ट कर दिया था।

क्या होता है लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) ?

लो अर्थ ऑर्बिट धरती के सबसे पास वाली कक्षा होती है। यह धरती से 2000 किमी ऊपर होती है। धरती की इस कक्षा में ज्यादातर टेलीकम्युनिकेशन सेटेलाइट्स को रखा जाता है।

क्या होता है स्पेस वॉर ?

माना जा रहा है कि अगला विश्‍व युद्ध धरती पर नहीं अंतरिक्ष में लड़ा जाएगा। इसे देखते हुए दुनिया के कई देशों ने उपग्रहों का प्रक्षेपण तेज कर दिया है। सभी देश अंतरिक्ष में अपनी ताकत तेज करने में लगे हुए हैं। जून 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक स्पेस फोर्स बनाने का एलान कर अंतरिक्ष में हथियारों और सेनाओं की मौजूदगी को लेकर बहस छेड़ दी थी। उन्होंने अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन को स्पेस-फोर्स बनाने का आदेश दिया था। स्पेस-फोर्स के फैसले को वो देश की निजी सुरक्षा से जुड़ा मानते हैं।

क्या होगा भारत को फायदा ?

पाकिस्तान और चीन की और से लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत को इसका बहुत फायदा होगा। चीन और पाकिस्तान की मिसा‍इलों का भारत की रडार से बचना अब खासा मुश्किल हो जाएगा। इससे न सिर्फ भारत का दुनिया में दबदबा बढ़ेगा बल्कि भारत की सुरक्षा व्यवस्‍था बेहद मजबूत हो जाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के उन तमाम वर्गो को सामाजिक सुरक्षा से लैस कर दिया जो अब तक इन सुविधाओं से वंचित थे।  पीएम ने अपनी गुजरात यात्रा के दूसरे दिन असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे कामगारों के लिए इस बड़ी योजना की शरूआत की। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये योजना देश के श्रमजीवियों,कर्मजीवियों को समर्पित है और मां भारती के भाल पर ये एक तिलक के समान है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि ग़रीबी कैसी होती है और एक मज़दूर का जीवन कितना संघर्षपूर्ण होता है इसे उन्होने नज़दीक से देखा है। वजह यही है आज़ादी के बाद जो काम ग़रीबों,मज़दूरों और कामगारों के हित के लिए नहीं हुआ उसे सिर्फ 55 महीने वाली सरकार ने मुमकिन करके दिखाया है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और मजदूरों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना की घोषणा इस साल फरवरी में अंतरिम बजट में की गई थी। श्रम योगी मानधन योजना से वे सभी लोग जुड़ सकते हैं जिनकी आय 15 हज़ार प्रति माह है या इससे कम है।

इस योजना में स्वैच्छिक रूप से वो लोग जुड़ सकते हैं जो योग्य हों। योजना के साथ जुड़ने की उम्र 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की है। किसी भी कॉमन सेंटर पर जाकर रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है। 60 वर्ष की उम्र के बाद जुड़ने वाले पात्र व्यक्तियों 3 हज़ार प्रति माह की निश्चित राशि पेंशन के रूप में मिलेगी। इसके तहत 18 वर्ष की उम्र में जुड़ने वाले व्यक्ति को 55रु. प्रति माह 29 वर्ष की आयु में जुड़ने वाले को 100रु. प्रति माह और 40वर्ष की उम्र में जुड़ने वाले व्यक्ति को 200रु. प्रति माह का अंशदान देना होगा। 

योजना से असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ श्रमिकों को लाभ मिलेगा। पीएम ने 'प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना' के तहत 11 लाख 51 हजार लाभार्थियों तक 13 करोड़ 58 लाख 31 हजार 918 रुपये की धनराशि सीधे श्रमिकों के पेंशन खातों में ट्रांसफर की। दरअसल, मेहनतकश लोगों तक सामाजिक लाभ पहुंचे इसके लिए सरकार ने प्रधानमंत्री बीमा योजना भी लागू की है। अब बीमा के बाद पेंशन योजना की शुरुआत असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए नई उम्मीद है। 

पुलवामा आतंकी हमले और फिर भारतीय वायुसेना की ओर से 26 फरवरी को पाकिस्‍तान के बालाकोट में की गई एयर स्‍ट्राइक के बाद पाकिस्‍तान ने भारतीय हवाई क्षेत्र के उल्‍लंघन की कोशिश की, जिसे भारत ने सतर्कता से विफल कर दिया। हालांकि इस दौरान एक मिग-21 बायसन हादसे का शिकार हो गया और पायलट को पाकिस्‍तान ने अपनी हिरासत में ले लिया।

विंग कमांडर को पाकिस्‍तान द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद जेनेवा संधि की चर्चा हो रही है। इस चर्चा को इन आरोपों के बीच बल मिला कि पाकिस्‍तान में भारतीय विंग कमांडर के बीच बदसलूकी की गई और 'युद्ध बंदी' के साथ इस तरह का सलूक जेनेवा संधि का उल्‍लंघन है।

क्‍या है जेनेवा कन्‍वेंशन?

जेनेवा कन्‍वेंशन (1949) अंतरराष्‍ट्रीय संधियों का एक सेट है, जिसमें चार संधियां और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल हैं। यह सुनिश्चित करता है कि युद्ध में शामिल सभी पक्ष नागरिकों और मेडिकल कर्मचारियों के साथ अंतरराष्‍ट्रीय कानून के तहत मानवीय व्‍यवहार करेंगे। दूसरे शब्‍दों में कहें तो यह कैदियों के युद्धकालीन बुनियादी अधिकारों (नागरिक और सैन्य) को परिभाषित करता है।

कौन होते हैं युद्धबंदी?

युद्ध के दौरान अगर कोई सैनिक शत्रु देश की सीमा में दाखिल हो जाता है और उसे गिरफ्तार किया जाता है तो वह युद्धबंदी माना जाएगा और शत्रु पक्ष उन्‍हें डरा-धमका या अपमानित नहीं कर सकता। कन्‍वेंशन यह प्रावधान भी करता है कि ऐसा कुछ भी न किया जाए, जिससे आम लोगों में उनके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़े। विंग कमांडर अभिनंदन के संदर्भ में संधि के उल्‍लंघन की बात इसलिए भी सामने आ रही है, क्‍योंकि सोशल मीडिया पर उनके कई वीडियो सामने आए हैं।

युद्ध बंदियों के क्‍या अधिकार हैं?

जेनेवा कन्‍वेंशन के तहत युद्धबंदियों को किसी तरह की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती और न ही उन्‍हें किसी तरह की सूचना देने के लिए शारीरिक या मानसिक तौर पर बाध्‍य किया जा सकता है। उनके साथ किसी भी तरह की जोर-जबरदस्‍ती निषेध है। अगर वह किसी सवाल का जवाब न देना चाहे तो उन्‍हें इसके लिए दंडित नहीं किया जा सकता और न ही उनका इस्‍तेमाल मानवीय ढाल (human shield) की तरह किया जा सकता है। हालांकि पकड़े जाने की स्थिति में युद्धबंदियों को अपना नाम, सैन्य पद और नंबर बताना होगा।

क्‍या युद्ध बंदियों को रिहा किया जा सकता है?

संध‍ि के प्रावधानों के तहत युद्धबंदियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का प्रावधान है। साथ ही एक विकल्प यह भी है कि युद्ध समाप्त हो जाने के बाद उन्हें संबंधित देश को वापस लौटा दिया जाए। संघर्षरत पक्षों को गंभीर रूप से घायल या बीमार सैनिकों को ठीक हो जाने के बाद उनके देश भेजना होगा। विभिन्‍न पक्ष इस बारे में समझौता कर सकते हैं और युद्धबंदियों की रिहाई या नजरबंदी के बारे में एक आम राय कायम कर सकते हैं। यहां उल्‍लेखनीय है कि 1971 के युद्ध के दौरान 80,000 से अधिक पाकिस्‍तानी सैनिकों ने भारत के सामने समर्पण कर दिया था, जिन्‍हें भारत ने 1972 के शिमला समझौते के तहत रिहा कर दिया था। विंग कमांडर अभिनंदन के संदर्भ में भी पाकिस्‍तान पर यह बात लागू होती है।

कौन निर्धारित करता है इस संधि का पालन हो रहा है या नहीं?

जेनेवा संधि का अनुपालन समुचित तरीके से हो रहा है या नहीं, इसका निर्धारण आम तौर पर अंतरराष्‍ट्रीय रेड क्रॉस समिति करती है। कारगिल युद्ध के दौरान भी पाकिस्‍तान ने दो भारतीय पायलटों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पाकिस्‍तान ने बाद में रिहा कर दिया था, जबकि एक अन्‍य युद्ध बंदी स्‍क्‍वाड्रन लीडर अजय आहूजा पाकिस्‍तान की कैद में ही शहीद हो गए थे।

भारत में सन् 1986 से प्रतिवर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) मनाया जाता है। प्रोफेसर सी.वी. रमन (चंद्रशेखर वेंकटरमन) ने सन् 1928 में कोलकाता में इस दिन एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज की थी, जो ‘रमन प्रभाव’ के रूप में प्रसिद्ध है। रमण की यह खोज 28 फरवरी 1930 को प्रकाश में आई थी। इस कारण 28 फरवरी राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस दिवस का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करना, विज्ञान के क्षेत्र में नए प्रयोगों के लिए प्रेरित करना तथा विज्ञान एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाना है। इस दिन, विज्ञान संस्थान, प्रयोगशाला, विज्ञान अकादमी, स्कूल, कॉलेज तथा प्रशिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक गतिविधियों से संबंधित प्रोग्रामों का आयोजन किया जाता हैं। रसायनों की आणविक संरचना के अध्ययन में 'रमन प्रभाव' एक प्रभावी साधन है। 

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस देश में विज्ञान के निरंतर उन्नति का आह्वान करता है, परमाणु ऊर्जा को लेकर लोगों के मन में कायम भ्रातियों को दूर करना इसका मुख्य उद्देश्य है तथा इसके विकास के द्वारा ही हम समाज के लोगों का जीवन स्तर अधिक से अधिक खुशहाल बना सकते हैं।  

रमन प्रभाव में एकल तरंग- दैध्र्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें, जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है तब इसकी छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं। इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं। > भौतिक शास्त्री सर सी.वी. रमन एक ऐसे महान आविष्कारक थे, जो न सिर्फ लाखों भारतीयों के लिए बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। यह किरणें माध्यम के कणों के कंपन एवं घूर्णन की वजह से मूल प्रकाश की किरणों में ऊर्जा में लाभ या हानि के होने से उत्पन्न होती हैं। इतना ही नहीं इसका अनुसंधान की अन्य शाखाओं, औषधि विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा दूरसंचार के क्षेत्र में भी बहुत महत्व है।

केंद्र सरकार ने 27 फ़रवरीं 2019 को आंध्र प्रदेश के लिए एक अलग नया रेलवे जोन दक्षिण तटीय रेलवे (एससीओआर-South Coast Railway) की स्थापना की घोषणा की है ।  इस रेलवे जोन में गुंतकल, गुंटूर तथा विजयवाड़ा डिवीज़न शामिल होंगे। यह डिवीज़न केन्द्रीय रेलवे के अधीन आते हैं। दक्षिणी केन्द्रीय रेलवे में हैदराबाद, सिकंदराबाद तथा नांदेड़ डिवीज़न शामिल होंगे। वाल्टेयर डिवीजन को दो भागों में बाटा जाएगा। वाल्टेयर डिवीजन के एक हिस्से को नए मंडल यानि दक्षिण तटीय रेलवे में शामिल करके पड़ोसी विजयवाड़ा डिवीजन में मिला लिया जाएगा। वाल्टेयर डिवीजन के बाकी हिस्से को एक नए डिवीजन में परिवर्तित कर दिया जाएगा। इसका मुख्यालय पूर्वी तटीय रेलवे के अधीन रायगडा में होगा। दक्षिण मध्य रेलवे में हैदराबाद, सिकंद्राबाद और नान्देड़ डिवीजन शामिल होंगे। 

आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 की अनुसूची 13 (बुनियादी ढांची) की मद संख्या 8 के अनुसार भारतीय रेलवे बोर्ड से उत्तराधिकारी राज्य आंध्र प्रदेश में एक नए रेल मंडल की स्थापना की जांच पड़ताल करना अपेक्षित था। इस मामले में हितधारकों के साथ परामर्श करके विस्तृत जांच पड़ताल की गई और विशाखापत्तनम में मुख्यालय वाले नए मंडल का निर्माण करने का निर्णय लिया गया।

भारतीय रेलवे विश्व के सबसे उत्कृष्ट रेलवे नेटवर्क में से एक है, भारतीय रेलवे का 1,51,000 किलोमीटर ट्रैक, 7000 स्टेशन, 13 लाख कर्मचारी तथा 160 वर्षों का इतिहास है। भारत में रेलवे की शुरुआत 16 अप्रैल, 1853 को बोरी बंदर और थाने के बीच हुई थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'प्रधानमंत्री जन आरोग्य' योजना (आयुष्मान भारत योजना यानी ABY) की घोषणा की है. इसे पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया है. सरकार ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना चाहती है. 

सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) 2011 के हिसाब से ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ परिवार और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत योजना (ABY) के दायरे में आयेंगे. 

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में हर परिवार को सालाना पांच लाख रुपये का मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. साल 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लांच राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (NHBY) को भी आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) में मिला दिया गया है. 

ABY की योग्यता का निर्धारण कैसे होता है?
SECC के आंकड़ों के हिसाब से आयुष्मान भारत योजना (ABY) में लोगों को मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. SECC के आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण इलाके की आबादी में D1, D2, D3, D4, D5 और D7 कैटेगरी के लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल किये गए हैं. 

शहरी इलाके में 11 पूर्व निर्धारित पेशे/कामकाज के हिसाब से लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो सकते हैं. राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में पहले से शामिल लोग खुद ही आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो गए हैं.

ग्रामीण इलाके के लिए ABY की योग्यता 
आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: 

  • ग्रामीण इलाके में कच्चा मकान, परिवार में किसी व्यस्क (16-59 साल) का नहीं होना, परिवार की मुखिया महिला हो, परिवार में कोई दिव्यांग हो, अनुसूचित जाति/जनजाति से हों और भूमिहीन व्यक्ति/दिहाड़ी मजदूर

  • इसके अलावा ग्रामीण इलाके के बेघर व्यक्ति, निराश्रित, दान या भीख मांगने वाले, आदिवासी और क़ानूनी रूप से मुक्त बंधुआ आदि खुद आयुष्मान भारत योजना आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो जायेंगे.

शहरी इलाके के लिए ABY की योग्यता

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: भिखारी, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, मोची, फेरी वाले, सड़क पर कामकाज करने वाले अन्य व्यक्ति. कंस्ट्रक्शन साईट पर काम करने वाले मजदूर, प्लंबर, राजमिस्त्री, मजदूर, पेंटर, वेल्डर, सिक्योरिटी गार्ड, कुली और भार ढोने वाले अन्य कामकाजी व्यक्ति स्वीपर, सफाई कर्मी, घरेलू काम करने वाले, हेंडीक्राफ्ट का काम करने वाले लोग, टेलर, ड्राईवर, रिक्शा चालक, दुकान पर काम करने वाले लोग आदि आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होंगे.

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के विनिर्माण और उनके तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए फेम इंडिया योजना के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है।

कुल 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली यह योजना 1 अप्रैल, 2019 से तीन वर्षों के लिए शुरू की जाएगी। यह योजना मौजूदा ‘फेम इंडिया वन’ का विस्तारित संस्करण है। ‘फेम इंडिया वन’योजना 1 अप्रैल, 2015 को लागू की गई थी।

वित्तीय प्रभावः

फेम इंडिया योजना का दूसरा चरण 2019-20 से 2021-22 तक तीन वर्षों के लिए लागू किया जाएगा। इसके लिए कुल 10,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी।

प्रभावः

इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में इलेक्ट्रिक और हाईब्रिड वाहनों के तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके लिए लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में शुरूआती स्तर पर प्रोत्साहन राशि देने तथा ऐसे वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा विकसित करना है। यह योजना पर्यावरण प्रदूषण और ईंधन सुरक्षा जैसी समस्याओं का समाधान करेगी।

विवरणः

·         बिजली से चलने वाली सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर जोर।

·         इलेक्ट्रिक बसों के संचालन पर होने वाले खर्चों के लिए मांग आधारित प्रोत्साहन राशि मॉडल अपनाना, ऐसे खर्च राज्य और शहरी परिवहन निगमों द्वारा दिया जाना। 

·         सार्वजनिक परिवहन सेवाओं और वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए पंजीकृत 3 वॉट और 4 वॉट श्रेणी वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए प्रोत्साहन राशि।

·         2 वॉट श्रेणी वाले इलेक्ट्रिक वाहनों में मुख्य ध्यान निजी वाहनों पर केन्द्रित रखना।

·         इस योजना के तहत 2 वॉट वाले 10 लाख, 3 वॉट वाले 5 लाख, 4 वॉट वाले 55,000 वाहन और 7000 बसों को वित्तीय प्रोत्साहन राशि देने की योजना है।

·         नवीन प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन राशि का लाभ केवल उन्हीं वाहनों को दिया जाएगा, जिनमें अत्याधुनिक लिथियम आयोन या ऐसी ही अन्य नई तकनीक वाली बैट्रियां लगाई गई हों।

·         योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है इसके तहत महानगरों, 10 लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों, स्मार्ट शहरों, छोटे शहरों और पर्वतीय राज्यों के शहरों में तीन किलोमीटर के अंतराल में 2700 चार्जिंग स्टेशन बनाने का प्रस्ताव हैं।

·         बड़े शहरों को जोड़ने वाले प्रमुख राजमार्गों पर भी चार्जिंग स्टेशन बनाने की योजना है।

·         ऐसे राजमार्गों पर 25 किलोमीटर के अंतराल पर दोनों तरफ भी ऐसे चार्जिंग स्टेशन लगाने की योजना है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने  प्रधानमंत्री जी-वन (जैव ईंधन वातावरण अनुकूल फसल अवशेष निवारण) योजना के लिए वित्तीय मदद को मंजूरी दे दी है। इसके तहत ऐसी एकीकृत बायो-इथेनॉल परियोजनाओं को, जो लिग्नोसेलुलॉसिक बायोमास और अन्य नवीकरणीय फीडस्टॉक का इस्तेमाल करती हैं, के लिए वित्तीय मदद का प्रावधान है।

भारत सरकार ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम 2003 में लागू किया था। इसके जरिए पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण कर पर्यावरण को जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान से बचाना, किसानों को क्षतिपूर्ति दिलाना तथा कच्चे तेल के आयात को कम कर विदेशी मुद्रा बचाना है। वर्तमान में ईबीपी 21 राज्यों और 4 संघ शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत तेल विपणन कम्पनियों के लिए पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाना अनिवार्य बनाया गया है। मौजूदा नीति के तहत पेट्रोकेमिकल के अलावा मोलासिस और नॉन फीड स्‍टाक उत्पादों जैसे सेलुलोसेस और लिग्नोसेलुलोसेस जैसे पदार्थों से इथेनॉल प्राप्त करने की अनुमति दी गई है।

वित्तीय प्रभावः

जी-वन योजना के लिए 2018-19 से 2023-24 की अवधि में कुल 1969.50 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय को मंजूरी दी गई है। परियोजनाओं के लिए स्वीकृत कुल 1969.50 करोड़ रुपये की राशि में से 1800 करोड़ रुपये 12 वाणिज्यिक परियोजनाओं की मदद के लिए, 150 करोड़ रुपये प्रदर्शित परियोजनाओं के लिए और बाकी बचे 9.50 करोड़ रुपये केन्द्र को उच्च प्रौद्योगिकी प्रशासनिक शुल्क के रूप में दिए जाएंगे।

विवरणः

इस योजना के तहत वाणिज्यिक स्तर पर 12 परियोजनाओं को और प्रदर्शन के स्तर पर दूसरी पीढ़ी के 10 इथेनॉल परियोजनाओं को दो चरणों में वित्तीय मदद दी जाएगी।

1.      पहला चरण (2018-19 से 2022-23)- इस अवधि में 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन के स्तर वाली परियोजनाओं को आर्थिक मदद दी जाएगी।

2.      दूसरा चरण (2020-21 से 2023-24)- इस अवधि में बाकी बची 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन स्तर वाली परियोजनाओं को मदद की व्यवस्था की गई है।

·         परियोजना के तहत दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल क्षेत्र को प्रोत्साहित करने और मदद करने का काम किया गया है। इसके लिए उसे वाणिज्यिक परियोजनाएं स्थापित करने और अनुसंधान और विकास गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने का काम किया गया है।

·         ईबीपी कार्यक्रम के तहत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को मदद पहुंचाने के अलावा निम्नलिखित लाभ भी होंगे।

1.      जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता घटाने की भारत सरकार की परिकल्पना को साकार करना।

2.      जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैव ईंधन के इस्तेमाल का विकल्प लाकर उत्सर्जन के सीएचजी मानक की प्राप्ति।

3.      बायोमास और फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का समाधान और लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना।

4.      दूसरी पीढ़ी की इथेनॉल परियोजना और बायोमास आपूर्ति श्रृंखला में ग्रामीण और शहरी लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना।

5.      बायोमास कचरे और शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले कचरे के संग्रहण की समुचित व्यवस्था कर स्वच्छ भारत मिशन में योगदान करना।

6.      दूसरी पीढ़ी के बायोमास को इथेनॉल प्रौद्योगिकी में परिवर्तित करने की विधि का स्वदेशीकरण।

·         योजना के लाभार्थियों द्वारा बनाए गए इथेनॉल की अनिवार्य रूप से तेल विपणन कम्पनियों को आपूर्ति, ताकि वे ईबीपी कार्यक्रम के तहत इनमें निर्धारित प्रतिशत में मिश्रण कर सके।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 2022 तक पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इथेनॉल की कीमत ज्यादा रखने और इथेनॉल खरीद प्रक्रिया को आसान बनाने के तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद 2017-18 के दौरान इथेनॉल की खरीद 150 करोड़ लीटर ही रही, हालांकि यह देशभर में पेट्रोल में इथेनॉल के 4.22 प्रतिशत मिश्रण के लिए पर्याप्त है। इथेनॉल इसी वजह से बायोमास और अन्य कचरों से दूसरी पीढ़ी का इथेनॉल प्राप्त करने की संभावनाएं पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा तलाशी जा रही हैं। इससे ईबीपी कार्यक्रम के तहत किसी तरह होने वाली कमी को पूरा किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री जी-वन योजना इसी को ध्यान में रखते हुए लागू की गई है। इसके तहत देश में दूसरी पीढ़ी की इथेनॉल क्षमता विकसित करने और इस नए क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने का प्रयास किया गया है।

इस योजना को लागू करने का अधिकार पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक तकनीकी इकाई सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी को सौंपा गया है। इस योजना का लाभ उठाने के इच्छुक प्रोजेक्ट डेवलपरों को अपने प्रस्ताव समीक्षा के लिए मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति को सौंपने होंगे। समिति जिन परियोजनाओं की अनुशंसा करेगी उन्हें मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में संचालन समिति द्वारा मंजूरी दी जाएगी।

ब्रितानी शासनकाल ने भारत को कई चीज़ें दी हैं. इनमें से एक अहम चीज़ है पूरे देश का एक ही टाइमज़ोन में होना. कई लोगों के अनुसार ये अनेकता में एकता का प्रतीक है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी मानते हों कि भारतीय मानक समय यानी इंडियन स्टेंडर्ड टाइम एक अच्छी चीज़ है. पढ़िए क्यों. पूर्व से पश्चिम तक भारत 3,000 किलोमीटर यानी 1,864 मील तक चौड़ा है. देशान्तर रेखा पर देखें तो ये कम से कम 30 डिग्री तक के इलाके में फैला है. सूर्य को आधार बना कर होने वाली समय की गणना के अनुसार इसका मतलब है कि एक छोर से दूसरे छोर तक समय का फर्क कम से कम दो घंटे का है.

इस फर्क का अंदाज़ा न्यू यॉर्क और यूटा के समय को देखने पर पता चलता है. अगर ये दोनों जगहें भारत में होतीं तो दोनों जगहों पर समय एक ही होता. लेकिन, भारत में इस छोटे से फर्क का असर लाखों लोंगों पर पड़ा है.

भारत के सूदूर पश्चिमी छोर के मुकाबले देश के पूर्व में सूर्योदय तकरीबन दो घंटे पहले होता है.

पूरे देश के लिए एक मानक समय की आलोचना करने वालों का कहना है कि देश के पूर्वोत्तर में सूर्य की रोशनी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए ये ज़रूरी है कि भारत में दो मानक समय को स्वीकार किया जाए. पूर्व में सूर्य की रोशनी जल्दी पड़ती है और इस कारण वहां इसका इस्तेमाल पहले शुरु हो सकता है.

हमारे शरीर के भीतर एक घड़ी होती है जो एक नियत ताल पर चलती है, इसे सिर्काडियन रिदम कहते हैं. सूर्य का उदय होना और ढलना इस ताल को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. जैसे-जैसे सांझ होने लगती है हमारे शरीर में नींद को प्रभावित करने वाला हॉर्मोन मेलाटोनिन बनता है, इस कारण व्यक्ति को नींद आने लगती है.

चूंकि पूरे भारत में एक ही मानक समय को अपनाया गया है तो देश भर के स्कूल लगभग एक ही समय पर खुलते हैं. लेकिन, जिन जगहों पर सूर्य देर से अस्त होता है वहां बच्चे देर में सोने जाते हैं और इस कारण उन्हें जितनी नींद मिलनी चाहिए उससे कम नींद मिलती है.

अगर सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी है तो बच्चे को इस कारण आधे घंटी की नींद कम मिलती है.

इंडियन टाइम सर्वे और भारतीय डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के तहत जमा किए गए आंकड़ों का आकलन करने के बाद मौलिक जगनानी का कहना है कि जिन जगहों पर सूर्य देर में डूबता है वहां बच्चों को मिलने वाली शिक्षा का वक्त भी कम हो जाता है और ऐसी जगहों में बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.

उनका कहना है कि सूरज के देर में डूबने के कारण अधिकतर ग़रीब परिवारों के बच्चों को नींद कम मिलती है. ख़ास कर ऐसे परिवारों में जो मुश्किल आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.

अमरीका ने शीत युद्ध के दौर के प्रमुख परमाणु ​हथियार समझौते इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फ़ोर्स यानी आईएनएफ़ संधि को स्थगित कर दिया है. फिलहाल अमरीका ने संधि को छह महीनों के लिए स्थगित कर दिया है और अगर रूस के साथ मतभेद हल नहीं होते हैं तो अमरीका संधि से बाहर निकल जाएगा.

अमरीका का कहना है कि रूस के क्रूज़ मिसाइल विकसित करने से संधि की शर्तों का उल्लंघन हुआ है. हालांकि, रूस अमरीका के इस आरोप से लगातार इनकार करता रहा है. दोनों ही पक्ष सं​धि का पालन न करने को लेकर एक-दूसरे को लंबे समय से आरोपी ठहराते आए हैं.

यह संधि एक महत्वपूर्ण हथियार नियंत्रण समझौता है जिस पर अमरीका और सोवियत संघ ने 1987 में हस्ताक्षर किए थे.

दुनिया की महाशक्तियों ने संधि के तहत ज़मीन से मार करने वाली 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर की रेंज वाली मध्यम दूरी की मिसाइलों और क्रूज़ मिसाइलों को नष्ट करने और प्रतिबंधित करने पर सहमति जताई थी. इसमें परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह की मिसाइलें शामिल हैं.

1970 में सोवियत रूस ने पश्चिमी यूरोप में एसएस-20 मिसाइल भेजी थी जिनसे नेटो में शामिल देशों की चिंताएं बढ़ गई थीं.

आईएनएफ संधि के परिणामस्वरूप, अमरीका और सोवियत संघ ने जून 1991 तक 2,692 छोटी, मध्यम और मध्यवर्ती दूरी की मिसाइलों को नष्ट कर दिया था.

आईएनएफ़ का टूटना एसटीएआरटी संधि के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है. साल 2010 में हुई यह संधि लंबी दूरी की रणनीतिक मिसाइलों के लिए सीमा निर्धारित करती है. यह संधि 2021 में खत्म हो रही है.

अगर अमरीका और रूस दोनों तैयार होते हैं तो ये संधि पांच साल के लिए आगे बढ़ाई जा सकती है. लेकिन, कई विश्लेषकों की चिंताएं हैं कि वर्तमान में बिगड़ते राजनीतिक हालात में इस महत्वपूर्ण संधि को खतरा हो सकता है.

क्यों हुआ टकराव?

अमरीका साल 2014 से रूस पर मध्यम दूरी की नोवाटोर 9एम729 मिसाइल बनाकर संधि के उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है.

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, रूस के पास संधि को तोड़ने वाली क़रीब 100 मिसाइलें हैं.

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, ''सालों से रूस बिना किसी पछतावे के आईएनएफ संधि की शर्तों को तोड़ता आ रहा है. एक पक्ष के समझौते का पालन न करने की स्थिति में उसमें बने रहना अच्छा नहीं है.''

वहीं, रूस कहता है कि उसकी मिसाइल 500 किमी से कम की रेंज में है और आरोप लगाता है कि अमरीका का पोलैंड और रोमानिया में ज़मीन से मार करने वाला बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम रूस पर हमले के लिए प्रतिबंधित मिसाइलों के इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

जबकी अमरीका का कहना है कि उसका मिसाइल डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से आईएनएफ की शर्तों के अनुरूप है.

रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रिएटकोफ ने कहा कि अमरीका का आईएनएफ की संधि से पीछे हटना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है. उन्होंने ये बात माइक पोम्पियो की घोषणा से पहले कही थी.

उन्होंने कहा, ''यह अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण प्रणाली और सामूहिक विनाश के हथियारों के अप्रसार की प्रणाली के लिए एक गंभीर झटका होगा. एक पक्ष का इसे तोड़ना गैरजिम्मेदाराना रवैया होगा.''

नेटो ने अमरीका के दावे का समर्थन किया है और एक बयान जारी कर रूस को पूरी तरह इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.

नेटो ने कहा, ''अगर रूस अपनी 9एमएस729 प्रणाली को नष्ट करके आईएनएफ संधि का सम्मान नहीं करता और अमरीका के संधि से निकलने से पहले पूरी तरह संधि का पालन नहीं करता तो रूस इस संधि के ख़त्म होने के लिए अकेला ज़िम्मेदार होगा.''

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा 124वां संविधान संशोधन विधेयक 9 जनवरी 2019 को राज्यसभा में भी पास हो गया। उच्च सदन में विपक्ष सहित लगभग सभी दलों ने इस विधेयक का समर्थन किया। बिल को लेकर राज्यसभा में हुई वोटिंग के दौरान इसके समर्थन में 165 और खिलाफ में केवल 7 वोट पड़े। इससे पहले बिल को सिलेक्ट कमिटी के पास भेजने के लिए कनिमोझी ने प्रस्ताव रखा था। हालांकि वोटिंग के दौरान इसके पक्ष में 18 और खिलाफ में 155 वोट पड़े। इसके साथ ही बिल को सिलेक्ट कमिटी में भेजने की मांग खारिज हो गई। 

आपको बता दें कि 124वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा ने एक  दिन पहले 8 जनवरी 2019 को ही बहुमत के साथ पारित कर दिया था। सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि इस विधेयक को राज्यों की मंजूरी लेने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में इस विधेयक को मंजूरी के लिए अब सीधे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। कुछ विपक्षी दलों ने इस विधेयक को लोकसभा चुनाव से पहले लाए जाने को लेकर सरकार की मंशा तथा इस विधेयक की न्यायिक समीक्षा में टिक पाने को लेकर आशंका जताई। हालांकि सरकार ने दावा किया कि कानून बनने के बाद यह न्यायिक समीक्षा की अग्निपरीक्षा में भी खरा उतरेगा क्योंकि इसे संविधान संशोधन के जरिए लाया गया है। 

मुख्य तथ्य

1. इसके पूर्व 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएँ प्रदान करने की माँग हुईं.

2. मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी.झ् नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया.

3. सिन्नो कमीशन (कमीशन टू एग्ज़ामिन सब-कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया.

4. मोदी सरकार ने इसी कमिशन की सिफ़ारिश के आधार पर संविधान संशोधन बिल तैयार किया है.

5. प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा. अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.

6. संविधान के आर्टिकल 15 में 15.6 जोड़ा गया है जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा.

7. इसके अनुसार आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है.

8. संविधान के 16 आर्टिकल में एक बिंदु जोड़ा जाएगा जिसके अनुसार राज्य सरकार और केंद्र सरकार 10 फ़ीसदी आरक्षण दे सकते हैं.

9. ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा.

चीन ने चांद के अनदेखे हिस्से पर दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान उतारने में सफलता हासिल की है. उसके अनदेखे हिस्से का अध्ययन करने के लिए पहली बार कोई मिशन लांच किया गया है. यह उपलब्धि अंतरिक्ष में सुपरपावर बनने की दिशा में चीन के बढ़ते कदम की गवाह है. चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (सीएनएसए) ने घोषणा की कि यान चांग‘ई-4 ने चंद्रमा की दूसरी ओर की सतह को छुआ. चांद के इस हिस्से को डार्क साइड भी कहा जाता है.चांग‘ई-4 का प्रक्षेपण शिचांग के प्रक्षेपण केंद्र से 08 दिसंबर 2018 को लॉन्ग मार्च 3बी रॉकेट के जरिये किया गया था. चीन को 03 जनवरी को 2019 को सफलता हासिल हुई. ये यान अपने साथ एक रोवर भी लेकर गया है. लो फ्रीक्वेंसी रेडियो एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेशन की मदद से चांद के इस हिस्से के बारे में पता लगाएगा.

चंद्र अभियान चांग‘ई-4 का नाम चीनी पौराणिक कथाओं की चंद्रमा देवी के नाम पर रखा गया है.मिशन के तहत घाटियों का अध्ययन: इस मिशन के तहत वहां की भू-संरचनाओं व घाटियों का अध्ययन किया जाएगा. इसके अतिरिक्त चांद पर मौजूद खनिजों और उसकी सतह की संरचना का भी पता लगाया जाएगा. इस यान के साथ चार विशेष वैज्ञानिक उपकरण भी भेजे गए हैं जिनका इस्तेमाल मिशन के दौरान किया जाएगा.

एक सेटेलाइट भी लांच किया गया: पृथ्वी से ना दिखाई देने के कारण चांद के उस हिस्से से सीधे संचार स्थापित करना लगभग नामुमकिन है. इसी कारण चांग‘ई-4 से संपर्क स्थापित करने के लिए एक सेटेलाइट भी लांच किया गया है. क्यूकिआओ नाम का यह सेटेलाइट मई 2018 में लॉन्घ्च कर दिया गया था.सोवियत संघ ने ली पहली तस्वीरः उल्लेखनीय है कि चंद्रमा का आगे वाला हिस्सा हमेशा धरती के सम्मुख होता है और वहा कई समतल क्षेत्र हैं. इस पर उतरना आसान होता है, लेकिन इसकी दूसरी ओर की सतह का क्षेत्र पहाड़ी और काफी ऊबड़-खाबड़ है.

सोवियत संघ ने वर्ष 1959 में पहली बार चंद्रमा की दूसरी तरफ की सतह की पहली तस्वीर ली थी, लेकिन अभी तक कोई भी चंद्र लैंडर या रोवर चंद्रमा की विमुख सतह पर नहीं उतर सका था.

चीन अकादमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी: चीन ने अंतरिक्ष की खोज के लिए चीन अकादमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी की स्थापना वर्ष 1968 में की थी. यहां 27 हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं. यह अकादमी वल्र्ड क्लास अकादमी में से एक है जो बेहतरीन स्पेसक्राफ्ट बनाती है.चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है. यह सौर मंडल का पाचवाँ,सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है. पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी 3,84,403 किलोमीटर है. यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के 30 गुना है. चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1/6 है. यह पृथ्वी कि परिक्रमा 27.3 दिन में पूरा करता है और अपने अक्ष के चारों ओर एक पूरा चक्कर भी 27.3 दिन में लगाता है.

चांद की एक ओर अंधेरा क्यों रहता है?

चांद का हमेशा एक ही हिस्सा हमें इसलिए दिखता है, क्योंकि जिस गति से वह पृथ्वी के चक्कर लगाता है, उसी गति से अपनी धुरी पर भी चक्कर लगाता है. यही कारण है कि चांद का एक हिस्सा हमें नहीं दिखाई देता है.

असम में आज नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन जारी कर दिया गया है. नये मसौदे में असम में बसे सभी भारतीय नागरिकों के नाम पते और फोटो हैं. कुल 3.29 करोड़ आवेदन में 2.89 करोड़ लोगों के नाम नेशनल रजिस्टर में शामिल किए जाने के योग्य पाए गए हैं. वहीं 40 लाख लोग वैध नागरिक नहीं पाए गए. हालांकि यह फाइनल लिस्ट नहीं है बल्कि ड्राफ्ट है. जिनका नाम इस ड्राफ्ट में शामिल नहीं है वो इसके लिए दावा कर सकते हैं.   

यह पहला मौका है जब राज्य में अवैध रूप से रहने वाले लोगों के बारे में जानकारी मिल सकेगी. देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़े अलग रूप में राज्य में असम समझौता 1985 लागू है. इसके मुताबिक 24 मार्च 1971 की आधी रात तक सूबे में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा.

असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने पर सड़क से लेकर संसद तक संग्राम मचा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई में विपक्षी दल जहां सरकार पर हमलावर हैं, वहीं बीजेपी इसे एक बड़ा कदम बता रही है। मंगलवार को राज्यसभा में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एनआरसी को 1985 में राजीव सरकार द्वारा किए गए असम अकॉर्ड का हिस्सा बताया। शाह के इस बयान पर जबर्दस्त हंगामा हुआ। शाह ने कहा कि 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड को डिक्लेयर किया, लेकिन इसके बाद इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी। आइए आपको बताते हैं कि 1985 में राजीव सरकार द्वारा साइन किए गए असम अकॉर्ड में आखिर था क्या और एनआरसी से इसका क्या कनेक्शन है.

देश में असम ही एक मात्र राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़ा अलग है। प्रदेश में 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा। 

बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर राजीव गांधी ने एजीपी से किया था समझौता असम में 1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद से असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में भी जोर पकड़ा और सिटिजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। इसका इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया था। आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ। 

राजीव ने अवैध बांग्लादेशियों को बाहर करने का आश्वासन दिया था 
असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ। राजीव गांधी ने अवैध बांग्लादेशियों को प्रदेश से बाहर करने का आश्वासन दिया था। इस समझौते में कहा गया कि 24 मार्च 1971 तक असम में आकर बसे बांग्लादेशियों को नागरिकता दी जाएगी। इस तय समय के बाद आए बाकी लोगों को राज्य से डिपोर्ट किया जाएगा। 

एनआरसी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश 
बाद के सालों में यह मामला लटकता चला गया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है।

भारतमाला नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट हैं। इसके तहत नए हाईवे के अलावा उन प्रोजेक्ट्स को भी पूरा किया जाएगा तो अब तक अधूरे हैं। इसमें बॉर्डर और इंटरनेशनल कनेक्टिविटी वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को शामिल किया गया है। पोर्ट्स और रोड, नेशनल कॉरिडोर्स को ज्यादा बेहतर बनाना और नेशनल कॉरिडोर्स को डेपलप करना भी इस प्रोजेक्ट में शामिल है। इसके अलावा बैकवर्ड एरिया, रिलीजियस और टूरिस्ट साइट्स को जोड़ने वालेनेशनल हाइवे बनाए जाएंगे।

भारतमाला परियोजना के तहत भारत सरकार ने 7 फेज में 34,800 किलोमीटर सड़कें बनाने का फैसला लिया है। इसके तहत नेशनल हाईवे, बॉर्डर्स, कोस्टल एरिया को जोड़ा जाएगा। ईस्टर्न और वेस्टर्न बॉर्डर्स पर 3,300 किमी रोड बनाई जाएंगी। लुधियाना-अजमेर और मुंबई-कोचीन के बीच नया नेशनल हाईवे बनाया जाएगा। लुधियाना-अजमेर के प्रपोज्ड हाईवे में दूरी 721 किमी तो हो जाएगी, लेकिन दोनों शहरों के बीच ट्रैवल टाइम घटकर 9 घंटे 15 मिनट हो जाएगा। मौजूदा 627 किमी लंबे हाईवे में अभी 10 घंटे लगते हैं। इसी तरह, प्रपोज्ड मुंबई-कोचीन हाईवे में दूरी 200 किमी बढ़ जाएगी, वक्त करीब 5 घंटे कम हो जाएगा।

कैटिगरी

किलोमीटर

इकोनॉमिक कॉरिडोर
9000
इंटर कॉरिडोर/फीडर रूट
6000
नेशनल कॉरिडोर एफिशिएंसी इम्प्रूवमेंट                              
5000
बॉर्डर रोड/इंटरनेशनल कनेक्टिविटी
2000
कोस्टल रोड/पोर्ट कनेक्टिविटी
2000
ग्रीन फील्ड एक्स्प्रेसवे
800
बैलेंस NHDP वर्क्स
10,000

कितना खर्चा आएगा?

 5.35 लाख करोड़ रुपए खर्च आएगा। इस भारतमाला परियोजना को कैबिनेट ने 24.10.2017 को मंजूरी दी।

पैसा कहां से आएगा?

भारतमाला प्रोजेक्ट के लिए 2.09 लाख करोड़ रुपए मार्केट, 1.06 लाख करोड़ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और 2.19 लाख करोड़ CRF/TOT/टोल के जरिए आएगा।

लुधियाना-अजमेर, मुंबई-कोचीन के प्रपोज्ड हाईवे में कितना वक्त बचेगा?

मौजूदा लुधियाना-अजमेर नेशनल हाईवे के बीच की दूरी 627 किमी है। इसके लिए अभी 10 घंटे का वक्त लगता है।

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले हाईवे में दूरी 100 किमी बढ़कर 721 किमी हो जाएगी, लेकिन करीब 45 मिनट की बचत होगी। नए रूट में करीब 9 घंटे 15 मिनट लगेंगे।

मौजूदा मुंबई-कोचीन नेशनल हाईवे के बीच की दूरी 1346 किमी है। अभी इस सफर में 29 घंटे का वक्त लगता है। 

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले नए रूट के तहत दूरी बढ़कर 1537 किमी हो जाएगी, लेकिन वक्त 5 घंटे कम हो जाएगा। इस सफर को पूरा करने में करीब 24 घंटे का वक्त लगेगा।

बॉर्डर्सऔर कोस्टल एरिया में कितने किमी सड़क बनेंगी?

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत ईस्टर्न और वेस्टर्न बॉर्डर्स पर 3300 किमी रोड बनाई जाएंगी। पहले फेज में 1000 किमी प्रस्तावित है। टूरिज्म और इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए 2100 किमी की कोस्टल रोड्स बनाई जाएंगी।

पोर्ट कनेक्टिविटी के लिए 2000 किमी की रोड बनाए जाएंंगी। इसे पहले फेज में बनाया जाएगा।

अभी कितने हाईवे हैं?

फिलहाल देश में 82 हाईवे हैं। इसमें 34 हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट किया जाना है। पहले फेज में 9 हाईवे के 680.64 किमी को चुना गया है। इस पर 6,258 करोड़ का खर्च आएगा।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी की संपत्ति में लगातार इजाफा हो रहा है। 38 अरब डॉलर (2.5 लाख करोड़ रुपये) की नेटवर्थ के साथ वो लगातार 10वें साल भारत के सबसे अमीर शख्स बनकर उभरे हैं। दिलचस्प बात यह है कि आर्थिक सुस्ती के दौर में भी टॉप 100 अमीर लोगों की नेटवर्थ (संपत्ति) में 26 फीसद का इजाफा हुआ है। अमीर लोगों का आंकलन करने वाली पत्रिका ने इंडिया रिच लिस्ट 2017 की सूची जारी की है।

इस सूची में मुकेश अंबानी टॉप पर बने हुए हैं। वहीं देश की तीसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्माता कंपनी विप्रो के प्रमुख अजीम प्रेमजी ने दूसरा स्थान हासिल किया है। उनकी कुल नेटवर्थ 19 अरब डॉलर की है। अजीम प्रेमजी ने इस सूची में दो स्थानों की छलांग लगाई है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में अब सिर्फ 3000 से भी कम गांव ऐसे बचे हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है. लेकिन, सरकार भी मानती है कि देश में चार करोड़ से ज्यादा ऐसे परिवार हैं जिनके पास घरों में बिजली का कनेक्शन नहीं है और वह अंधेरे में जीने को मजबूर हैं. 25.09.2017 को यह ऐलान किया कि अब वह इस स्थिति को बदलने जा रही है. सोमवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती के मौके पर सौभाग्य नाम की योजना की शुरुआत की, जिसका मकसद है हर घर तक बिजली का कनेक्शन पहुंचाना.

इस योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह खुद मिट्टी तेल के दीए में पढ़ चुके हैं और इसलिए इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि जिन घरों में बिजली नहीं पहुंची है वहां जिंदगी कितनी मुश्किल होती है.

उन्होंने कहा कि सौभाग्य योजना से 2018 दिसंबर तक हर घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि देश में कोई भी घर अंधेरे में ना रहे. यानी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार इसे एक अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करना चाहेगी.

सौभाग्य योजना के लिए सरकार ने 16,320 करोड़ रुपये का बजट रखा है और हर घर तक बिजली पहुंचाने का 60 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी 10% खर्च राज्य सरकारों को उठाना होगा और 30% बैंकों से लोन लिया जाएगा. इस योजना की खास बात यह है कि लोगों को अपने घर में बिजली कनेक्शन पाने के लिए कोई खर्च नहीं करना होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस योजना के लागू होने के बाद बिजली का कनेक्शन पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के बार बार चक्कर काटने का सिलसिला भी बंद हो जाएगा. क्योंकि सरकार खुद लोगों के घर-घर जाकर बिजली कनेक्शन लगाएगी और उन लोगों की पहचान करेगी जिनके घर बिजली का कनेक्शन अभी तक नहीं है.

प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप का सहारा लिया जाएगा और लोग बिजली के कनेक्शन के लिए आवेदन देने से लेकर सारी कार्यवाही मोबाइल के जरिए ही पूरी कर सकेंगे. गरीब लोगों के लिए बिजली कनेक्शन पाने की प्रक्रिया पूरी तरह मुफ्त होगी. लेकिन बाकी लोगों को भी इसके लिए सिर्फ ₹500 खर्च करने होंगे और वह भी 10 किश्तों में बिजली बिल के साथ लिया जाएगा.

देश के दूरदराज इलाकों में जहां हर घर में बिजली का कनेक्शन पहुंचाना मुश्किल है वहां सरकार घरों को रोशन करने के लिए सौर ऊर्जा का सहारा लेगी और लोगों को बैटरी, 5 LED लाइट और एक पंखा भी दिया जाएगा.

सौभाग्य योजना से पहले मोदी सरकार ने हर घर तक एलपीजी गैस कनेक्शन पहुंचाने के लिए उज्ज्वला योजना चलाई थी जिसके तहत अब तक तीन करोड़ सिलेंडर के कनेक्शन बांटे जा चुके हैं. उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के चुनाव में BJP को उज्वला योजना का जबरदस्त फायदा मिला.

माना जा रहा है कि सौभाग्य योजना के पीछे पूरी ताकत लगाकर बीजेपी अगले लोकसभा चुनाव में इसे भी अपनी एक बड़ी कामयाबी के रूप में पेश करना चाहेगी.

देश में 40,000 रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर बहस तेज है। इस बीच देश में चकमा और हजोंग शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दे दी गई है। चकमा और हजोंग शरणार्थी भारत में बांग्लादेश के चटगांव के पहाड़ी क्षेत्रों से आए हैं। इन लोगों की जमीनें 1960 के दशक में वहां कर्णाफुली नदी पर बनी कापताई बांध परियोजना में चली गई थीं। इसके अलावा धार्मिक उत्पीड़न का भी इन्हें शिकार होना पड़ा है। चकमा बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, जबकि हजोंग हिंदू हैं।

चकमा लोग बंगाली-असमिया भाषा से मिलती-जुलती भाषा बोलते हैं। हजोंग तिब्बती-बर्मी भाषा बोलते हैं, हालांकि इसे असमिया की तरह ही लिखा जाता है। 

फिलहाल भारत में लगभग 1 लाख चकमा और हजोंग शरणार्थी रह रहे हैं।- वर्ष 1964 में जब ये लोग भारत आए थे, तब करीब 15,000 चकमा थे और 2,000 हजोंग थे।2015 के आंकड़ों के मुताबिक शुरुआती दौर में भारत आए तमाम लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से सिर्फ 5,000 लोग कैंपों में हैं।

2010-11 में गृह मंत्रालय की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों में इनकी आबादी 53,730 थी। 1987 में 45,000 अन्य चकमा लोगों ने बांग्लादेश से त्रिपुरा में प्रवेश किया था।

1947 में भारत विभाजन के बाद चटगांव को पूर्वी पाकिस्तान को सौंपे जाने के विरोध में चकमा बुद्ध आज भी 'चकमा ब्लैक डे' का आयोजन करते हैं। यही नहीं 1971 में जब बांग्लादेश का गठन हुआ तो वह उसका हिस्सा भी नहीं रहना चाहते थे। स्वायत्ता के लिए उन्होंने शांति वाहिनी के नाम से सशस्त्र संघर्ष भी शुरू किया था। बांग्लादेशी सेना से लड़ते हुए ये लोग लगातार भारत के त्रिपुरा राज्य में प्रवेश करते रहे।

1990 में चकमा लोगों से शेख हसीना सरकार ने शांति वार्ता की थी और उन्हें जनजाति का दर्जा दिया था। हालांकि अब भी चकमा वहां उ त्पीड़न के डर से भारत में ही बने रहना चाहते हैं।

2005 में चुनाव आयोग ने चकमा और हजोंग शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश की मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया था। अरुणाचल की मतदाता सूचियों में करीब 1,000 से ज्यादा चकमा लोगों के नाम शामिल हैं।

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने 09.09.2017 को देश की पहली ग्रीन फील्ड स्मार्ट सिटी का भूमि पूजन किया। लगभग 7000 करोड़ रुपये की यह परियोजना दो वर्षों में मूर्त रूप लेगी। उपराष्ट्रपति ने इसके साथ ही स्मार्ट सिटी परिसर में प्रस्तावित 690 करोड़ 71 लाख रुपये की लागत वाले अर्बन सिविक टावर, कंवेंशन सेंटर तथा झारखंड अर्बन प्लानिंग एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (जुपमी) के बिल्डिंग निर्माण की आधारशिला भी रखी।

इस बीच उन्होंने जहां झारखंड अर्बन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड (जुटकोल), रियल इस्टेट रेगुलेटरी अथारिटी (रेरा) और स्मार्ट सिटी की वेबसाइट की लांचिंग की, वहीं स्मार्ट सिटी के मास्टर प्लान का विमोचन भी किया।

रांची स्थिति एचईसी के कोर कैपिटल एरिया में प्रस्तावित स्मार्ट सिटी के भूमि पूजन समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्मार्ट सिटी की स्मार्ट परिकल्पना को धरातल पर उतारने के लिए स्मार्ट लीडर की जरूरत है। ऐसा लीडर जिसमें क्षमता हो, दूरदर्शिता हो, स्पष्टवादिता हो, जनता के प्रति कमिटमेंट हो। हाई-फाई, कोट-टाई, सूट-बूट नहीं चलेगा।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कि दुनिया आगे बढ़ रही है। फिर हम पीछे क्यों रहें? बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, 24 घंटे बिजली, जलापूर्ति, अच्छी सड़कें, सीवरेज, पार्क, आईटी कनेक्टिविटी, नो व्हीकल जोन, स्मार्ट मीटरिंग, वाटर हार्वेस्टिंग, सौर ऊर्जा, पैदल पथ आदि स्मार्ट सिटी की पहचान हैं।

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत को बड़ी कूटनीतिक जीत मिली है। चीन चाहता था कि भारत इस मंच पर पाक के खिलाफ आतंकवाद का मुद्दा न उठाए, लेकिन ब्रिक्स देशों की ओर से जो घोषणापत्र का मजमून सामने आया है, उसमें आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई है। और तो और, पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन की भी कड़ी निंदा की गई है। यह घोषणापत्र अहम है क्योंकि चीन कई बार जैश-ए-मोहम्मद चीफ मसूद अजहर पर यूएन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में अड़ंगा लगा चुका है। भारत आतंकवाद के मुद्दे पर चीन को साथ जोड़ने में कामयाब हो गया है। 

शायमेन डिक्लेरेशन में लिखा है, 'हम ब्रिक्स देशों समेत पूरी दुनिया में हुए आतंकी हमलों की निंदा करते हैं। हम सभी तरह के आतंकवाद की निंदा करते हैं, चाहे वो कहीं भी घटित हुए हों और उसे किसी ने अंजाम दिया हो। इनके पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। हम क्षेत्र में सुरक्षा के हालात और तालिबान, आईएसआईएस, अलकायदा और उसके सहयोगी, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश ए मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और हिज्ब-उत-ताहिर द्वारा फैलाई हिंसा की निंदा करते हैं।' 

घोषणापत्र में लिखा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। यह काम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक होना चाहिए। इसमें देशों की संप्रभुता का खयाल रखना चाहिए, अंदरूनी मामलों में दखल नहीं दिया जाना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम एक साथ हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि को स्वीकार किए जाने के काम में तेजी लाई जानी चाहिए। कट्टरपंथ रोके जाने का प्रयास होना चाहिए। 

ब्राजील, रूस्, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका ने सभी देशों से अपील की कि वे आतंकवाद से निपटने के लिए एक समग्र रूख अपनाए। आतंकवाद से निपटने के क्रम में चरमपंथ से निपटने और आतंकियों के वित्त पोषण के स्रोतों को अवरूद्ध करने की भी बात की गई।समूह ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति के साथ-साथ तालिबान, आईएसआईएस, अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद एवं हक्कानी नेटवर्क समेत इसके सहयोगी संगठनों द्वारा की जाने वाली हिंसा पर चिंता जाहिर की।समूह ने ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, तहरीक-ए-तालिबान और हिज्ब उत-तहरीर जैसे आतंकी संगठनों का भी जिक्र किया।

ब्रिक्स ने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से कंप्रीहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेरेरिज्म अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र समझौते को जल्दी ही अंतिम रूप दिए जाने और इसे अंगीकार किए जाने की मांग करते हैं।

भारत ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीन के शहर श्यामेन में हैं। पीएम ने ब्रिक्स बैठक में बोलते हुए कहा कि सभी देशों में शांति के लिए ब्रिक्स देशों का एकजुट रहना जरूरी है। उन्होंने सम्मेलन में आतंकवाद का भी मुद्दा उठाया। इस पर अन्य सदस्य देशों ने भी चिंता जताई। इससे पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पीएम मोदी का औपचारिक स्वागत किया।

बता दें कि ये ब्रिक्स का 9वां सम्मेलन है। ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देश शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास को आगे ले जाने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत भागीदारी का आज आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस ब्लॉक ने सहयोग के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित किया है और अनिश्चितता की तरफ बढ़ रही दुनिया में स्थिरता के लिए योगदान दिया है। मोदी ने आंतकवाद का भी मुद्दा उठाया। इस पर ब्रिक्स देशों ने क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति और तालिबान, अल-कायदा, पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी समूहों द्वारा की जा रही हिंसा पर चिंता जतायी।

चीन के शियामन शहर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि व्यापार और अर्थव्यवस्था  ब्रिक्स-ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच सहयोग का आधार हैं। उन्होंने विकासशील देशों की संप्रभु और कॉरपोरेट कंपनियों की वित्तीय आवयश्यकताओं को पूरा करने के लिए ब्रिक्स रेटिंग एजेंसी बनाए जाने का भी आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि नवोन्मेष और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सदस्य देशों के बीच मजबूत भागीदारी विकास को आगे ले जाने, पारदर्शिता को बढ़ाने और सतत विकास लक्ष्यों का समर्थन करने में मदद कर सकती है। उन्होंने सदस्य देशों के सेंट्रल बैंकों से अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने और समूह तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आकस्मिक विदेशी मुद्रा कोष व्यवस्था के बीच सहयोग को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया।मोदी ने स्मार्ट शहरों, नगरीकरण और आपदा प्रबंधन में सहयोग की रफ्तार बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स ने सहयोग, स्थिरता में योगदान तथा अनिश्चितता की दिशा में बढ़ रही दुनिया में विकास के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित किया है। हमारे प्रयास आज कृषि, संस्कृति, पर्यावरण, ऊर्जा, खेल तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े हैं। मोदी ने कहा कि गरीबी उन्मूलन और स्वास्थ्य, स्वच्छता, कौशल, खाद्य सुरक्षा, लैंगिक समानता, ऊर्जा तथा शिक्षा सुनश्चित करने के लिए समूह मिशन मोड में है। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम उत्पादकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम हैं जो महिलाओं को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में लाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय शांति और विकास के लिए सभी करें काम- जिनपिंग 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि जिस तरह से दुनिया में परिवर्तन हुए हैं, उसके बाद ब्रिक्स में देशों का सहयोग अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय परिस्थितियों में हमारे मतभेदों के बावजूद हमारे 5 देश डीजीएचपीएनएटी के समान चरण में हैं और समान विकास साझा करते हैं। हमें एक आवाज से बात करनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं विकास से संबंधित मुद्दों के लिए संयुक्त रूप से समाधान पेश करना चाहिए। चीन ने एनडीबी परियोजना तैयार करने के लिए 4 मिलियन अमेरिकन डॉलर का योगदान दिया है ताकि बैंक का संचालन और  और उसका विकसा लंबे समय तक किया जा सके। शी ने कहा  कि दुनिया के अन्य भागों से भी हमें अपने संबंध मधुर बनाने की जरूरत है। उन्होंने  कहा कि ब्रिक्स के हम 5 देश वैश्विक शासन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसलिए हमारे सहयोग के बिना दुनिया की चुनौतियों का समाधान नहीं हो सकता।

देश के पूर्व राष्ट्रपति और एक महान वैज्ञानिक के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि (27.07.2017) पर उन्हें देशभर में याद किया गया एवं श्रद्धांजलि दी गई. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की दूसरी पुण्यतिथि पर आज ओडिशा सरकार ने भद्रक जिले में बाहरी व्हीलर द्वीप का नाम एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप रखा है.

राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री महेश्वर मोहंती ने बताया कि राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग ने गृह मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलने के बाद कल गजट अधिसूचना जारी की. मोहंती ने गजट अधिसूचना की एक प्रति मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को सौंपी , जिन्होंने पूर्व में व्हीलर द्वीप का नाम कलाम के नाम पर करने की घोषणा की है.

पटनायक ने पूर्व राष्ट्रपति की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि दीं. समारोह में उन्होंने भद्रक जिले में व्हीलर द्वीप और बालेश्वर जिले में चांदीपुर के अस्थायी प्रक्षेपण स्थल से कलाम के भावनात्मक जुड़ाव को याद किया.

श्रद्धांजलि देने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि कलाम ने देश की प्रतिरक्षा के लिए मिसाइल विकसित करने के अपने प्रयासों के तहत इन दो जगहों पर सबसे अधिक समय बिताया हैं.

यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत ‘आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना’ नामक एक नई योजना की शुरू कर रहा है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री राम कृपाल यादव ने कहा कि आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं की सुविधा प्रदान करके DAY-NRLM के तहत पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के सदस्यों को आजीविका का एक वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना है।

इस योजना के तहत आर्थिक विकास के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सहित प्रमुख सेवाओं और सुविधाओं के साथ दूरदराज के गांवों को एक दुसरे से जुड़ने के लिए ई-रिक्शा, 3 और 4-व्हीलर मोटर परिवहन वाहनों जैसी एक सुरक्षित, सस्ती और समुदाय निगरानी सहित ग्रामीण परिवहन सेवाएं प्रदान की जाएंगी।

आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का एक वैकल्पिक आजीविका बनाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की आर्थिक मदद से महिलाओं की सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। मंत्रालय ने घोषणा की है कि 2017-18 से 2019-20 तक 3 वर्षों की निर्धारित समय अवधि के लिए देश भर में 250 ब्लॉकों में जल्द ही कार्यान्वित किया जाएगा। उप-योजना के तहत दिए जाने वाले प्रस्तावों में से एक यह है कि सामुदायिक आधार संगठन (CBO) अपने स्वयं के कोष से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को वाहन खरीदने के लिए ब्याज रहित ऋण प्रदान करेगा।

एजीवीका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का उद्देश्य डीएआई-एनआरएलएम के तहत स्व-सहायता समूह (एसएचजी) के सदस्यों को आजीविका का एक वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना है। अब तक, कार्यक्रम के तहत 34.4 लाख महिलाएं एसएचजी समर्थित हैं। आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना, पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को संभालने के लिए सभी सुविधाएं प्रदान करेगी।

एजसी सभी दूरस्थ गांवों को मुख्य सेवाओं के साथ जोड़ने के लिए सुरक्षित, सस्ती और सामुदायिक निगरानी वाले ग्रामीण परिवहन वाहनों को प्रदान करना सुनिश्चित करेगा। जिन वाहनों का उपयोग इस योजना के तहत किया जाएगा वे हैं|

भारत, अमेरिका और जापान की नौसेना के बीच संयुक्त अभ्यास सोमवार को ख़त्म हो गया। इस अभ्यास का मक़सद तीनों देशों की सेनाओं के बीच सैन्य ऑपरेशन के दौरान बेहतर तालमेल बनाना है। इस दौरान समुद्र में तीनों देशों की सेनाओं की ताक़त और अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन किया गया।

अमेरिका, जापान और भारतीय नौसेना द्वारा 10 से 17 जुलाई के बीच बंगाल की खाड़ी में ऑपरेशन मालाबार नाम का नौसेना अभ्यास किया गया। इस नौसेना अभ्यास में तीनों देशों के विमान, नौसेना की परमाणु पनडुब्बियां और नौसैन्य पोत शामिल हुए। मालाबार सैन्य अभ्यास का लक्ष्य सामरिक रूप से प्रशांत क्षेत्र में तीनों नौसेनाओं के बीच गहरे सैन्य संबंध और तालमेल स्थापित करना है। भारत का आईएनएस विक्रमादित्य, जापान का जिमूआ और दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट करियर माना जाने वाला अमेरिका का यूएसएस निमित्ज़ भी इसमें शामिल हुआ।

मालाबार अभ्यास की प्रक्रिया एक साल पहले शुरू हुई थी और शुरुआती योजना छह महीने पहले बनी थी। इस नौसैनिक अभ्यास में तीनों देशों के करीब 95 विमान, 16 जहाज और दो पनडुब्बियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान समुद्र तट पर और समुद्र में अभ्यास किया गया। इसमें समूह अभियान, समुद्री गश्त और टोही कार्रवाई, सतह और पनडुब्बीरोधी युद्ध का अभ्यास किया गया। इस अभ्यास में चिकित्सा अभियान, ख़तरे कम से कम करने, विस्फोटक आयुध निपटान, हेलीकॉप्टर अभियान का भी अभ्यास किया गया।

गौरतलब है कि पीएम मोदी के अमेरिका दौरे में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि अमेरिकी सेना भारत के साथ आपसी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। दरअसल अमेरिका ने भारत को बड़ा रक्षा साझीदार माना है और इसी के चलते दोनों देशों में सहयोग बढ़ा है। भारत-अमेरिका और जापान के बीच नौसेना अभ्यास 1992 से शुरू हुआ था और तब से लगातार जारी है। दुनिया के मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए इस अभ्यास को अहम माना जा रहा है।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग कर लिया। व्‍हाइट हाउस के रोज गार्डन से प्रसारित अपने कॉन्‍फ्रेंस में उन्‍होंने इसकी घोषणा की। सन 2015 में पेरिस समझौते में 195 देशों ने सहमति जताई थी। इसके तहत जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों के उत्सर्जन को घटाना लक्ष्य है। समझौते के तहत अमेरिका ने 2025 तक 2005 के स्तर से अपने उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत कम करने का वादा किया था।

पेरिस जलवायु समझौते से अलग होने के बाद अमेरिका सीरिया और निकारागुआ के साथ आ गया जिन्होंने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान इस समझौते को अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश बताया था। 

अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से बाहर निकलने के फैसले पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्ष वर्धन ने कहा है कि भारत सरकार देश की भावी पीढ़ी को एक स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण देने के लिए प्रतिबद्ध है और वह इसे लेकर अपने प्रयासों को जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या फैसला लेता है, यह उसकी अपनी नीतियों पर निर्भर करता है। 

साइबर सुरक्षा वैश्विक सूचकांक (GCI) में भारत को 165 देशों में से 23 वां स्थान प्रदान किया गया. दूसरा ग्लोबल साइबर सिक्युरिटी इंडेक्स (जीसीआई) संयुक्त राष्ट्र के दूरसंचार एजेंसी इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) द्वारा जारी किया गया.

भारत, 0.683 के अंक के साथ इंडेक्स पर 23 वें स्थान पर है और परिपक्व श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है. सिंगापुर,  0.925 अंक के साथ सूचकांक में शीर्ष पर स्थित है.

साइबर सुरक्षा के शीर्ष 5 में स्थित देश है -1. सिंगापुर, 2. यूनाइटेड स्टेट्स, 3. मलेशिया, 4. ओमान, 5. एस्टोनिया

पीएम मोदी ने असम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की आधारशिला रखते हुए देश के लिए एक नई नीति की घोषणा की। मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 3 साल पूरे होने पर पीएम ने संपदा योजना (स्कीम फॉर एग्रो मरीन प्रोसेसिंग ऐंड डिवेलपमेंट ऑफ एग्रो प्रोसेसिंग क्लस्टर्स) को देश को समर्पित किया। सरकार ने समुद्री एवं विभिन्न कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग को गति देने के लिए लगभग 6000 करोड़ रुपए की एक नई फूड प्रोसेसिंग योजना संपदा (SAMPADA) को अपनी मंजूरी दे दी है जिसे 2016 से 2020 की अवधि में पूरी तरह लागू किया जाना है। 

इस योजना के तहत मिनिस्‍ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्‍ट्रीज के अंतर्गत एग्रो मैराइन प्रोसेसिंग एंड डवलेपमेंट ऑफ एग्रो क्‍लस्‍टर्स की योजनाओं को साल 2019-20 तक पूरा किया जाना है। मेगा एग्रो प्रोसेसिंग योजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद इनमें लगभग 31400 करोड़ रुपए का निवेश होने की पूरी संभावना है। सरकार को यह उम्‍मीद है कि इससे करीब 334 लाख टन खाद्य पदार्थों को खराब होने से पूरी तरह बचाया जा सकेगा और इसके एवज में लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्‍त बचत हर साल की जा सकेगी। इन योजनाओं से करीब 20 लाख किसानों को बहुत ही फायदा होगा और 5,305,00 लोगों को प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोजगार भी मिल सकेगा। फूड प्रोसेसिंग इंडस्‍ट्रीज मिनिस्‍टर हरसिमरन कौर ने इससे पहले कहा था कि कोल्‍ड चेन और प्रोसेसिंग सिस्‍टम के अभाव में हर साल लगभग 92 हजार करोड़ रुपए के खाद्य पदार्थ बेकार हो जाते हैं।

इस नई योजना के लिए लगभग 6,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। यह 31,400 करोड़ रुपए के निवेश को आकर्षित करने और 1,04,125 करोड़ रुपए मूल्य के 334 लाख टन कृषि उत्पादों के प्रबंधन की सुविधा भी देगी।

अगर चीन ने गीदड़भभकी के जरिये अपनी विस्तारवादी नीति को जायज ठहरने की कोशिश करेगा तो यह चीन को महंगा भी पड़ सकता है. २१वी सदी के भारत या अन्य किसी देश को कम करके आंकना चीनी खिलौनों की तरह उसका सपना बिखर जायेगा. 

सिक्किम सेक्टर में भारतीय और चीनी सेना के बीच महीने भर से जारी गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इससे पहले चीन के सरकारी मीडिया और थिंक टैंक ने कहा था कि इस विवाद से अगर उचित तरीके से नहीं निपटा गया तो इससे 'युद्ध' छिड़ सकता है। राजनयिक ने कहा कि चीन सरकार इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट है कि वह स्थिति का शांतिपूर्ण समाधान चाहती है और इसके लिए इलाके से भारतीय सैनिकों की वापसी 'पूर्व शर्त' है।

भारत चीन के बीच सीमा पर लगातार तनाव बरकरार है। इस बीच चीन की नौसेना के कई पोतों और पनडुब्बियों का हिन्दमहासागर में दखल देखा गया है। चीन की नापाक की हरकतों पर भारतीय नौसेना बारीकी से नजर बनाए हुए है और इसके लिए जीसैट-7 का इस्तेमाल कर रही है, जिसे भारत ने 29 सितंबर 2013 को लॉन्च किया था। 

हिंदमहासागर में चीन के बढ़ते हुए दखल को देखते हुए नौसेना समुद्री सीमाओं पर नजर बनाए हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत को चीनी नौसेना की हर कदम की जानकारी जीसैट-7 सेटेलाइट के जरिए मिल रही है। इस उपग्रह का नाम रुक्मिणी है।

आपको बता दें कि हाल ही में हिंदमहासागर क्षेत्र में 14 चीनी नौसेना पोतों को भारतीय समुद्री क्षेत्र में घूमते देखा गया था। इनमें आधुनिक लुआंग-3 और कुनमिंग क्लास स्टील्थ डेस्ट्रॉयर्स भी शामिल थे।

क्या है रुक्मिणी

यह भारत का पहला सैन्य सेटेलाइट है। 2,625 किलोग्राम वजन का यह सैटेलाइट हिंद महासागर क्षेत्र में नजर रखने में नौसेना की मदद कर रहा है। यह एक मल्‍टी-बैंड कम्‍युनिकेशन-कम सर्विलान्‍स सेटेलाइट है, जिसका 36,000 किमी की ऊंचाई से संचालन हो रहा है। इसके जरिए हिंद महासागर के विस्तृत जलक्षेत्र में 2000 किमी तक के दायरे में निगरानी करना भारतीय नौसेना के लिए काफी आसान हो गया है। रुक्मिणी सेटेलाइट जंगी बेड़ों, सबमरीन, समुद्री एयरक्राफ्ट की गतिविधियों का रियल टाइम अपडेट मुहैया कराता है। इस सेटेलाइट की जद में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ही हैं। 

2013 में भारत के पास 4 टन वर्ग के सैटलाइट को लॉन्च करने के लिए आधुनिक जीएसएलवी रॉकेट नहीं थे। इसकी वजह से भारत को 185 करोड़ रुपये कीमत वाले जीसैट-7 सैटलाइट को फ्रेंच गुएना से लॉन्च से किया गया था।

अब भारतीय वायुसेना के लिए भी इसी तरह का एक अन्य सैटलाइट जीसैट-7A विकसित किया जा रहा है। एक सूत्र ने बताया, 'इस सैटलाइट का लॉन्च साल के आखिर में होना है।' इसकी मदद से एयरफोर्स जमीन पर स्थित कई रेडार स्टेशनों, एयरबेसों और एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग ऐंड कंट्रोल (अवॉक्स) एयरक्राफ्ट्स से सीधे जुड़ सकेगी।

ये है विवाद की वजह

डोक ला इस क्षेत्र का भारतीय नाम है, जिसे भूटान डोकलाम के रूप में मान्यता देता है, जबकि चीन इसे अपने डोंगलांग इलाके का हिस्सा बताता है। भारत में चीन के राजदूत झाओहुई ने कहा, 'स्थिति गंभीर है, जिसने मुझे गंभीर चिंता में डाल दिया है। यह पहला मौका है जब भारतीय सैनिकों ने पारस्परिक सहमति वाली सीमा रेखा पारकर चीन की सीमा में प्रवेश किया है। इससे चीन और भारत के सीमा पर तैनात सैनिकों के बीच गहरा गतिरोध पैदा हो गया है। अब 19 दिन बीत चुके हैं लेकिन स्थिति अब भी सहज नहीं हो सकी है।' उन्होंने कहा कि भारत को चीन-भूटान सीमा वार्ता में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है और ना ही वह भूटान की तरफ से क्षेत्र को लेकर दावा करने के लिए अधिकृत है।

कहां है डोकलाम

संधि स्थल को भारत डोक ला कहता है। भूटान इसे डोकलाम कहता है। चीन इसी हिस्से में डोंगलोंग पर अपना दावा करता है। चीन और भूटान के बीच क्षेत्र पर दावे को लेकर वार्ता होती रही है। भूटान का चीन के साथ कोई कूटनीतिक रिश्ता नहीं है। भारत ही उसे सैन्य और कूटनीतिक समर्थन देता है। चीन का कहना है कि भारत के पास न तो चीन-भूटान सीमा विवाद में हस्तक्षेप का और न ही भूटान की तरफ से क्षेत्र पर दावे का अधिकार है।

अगर आप स्कूल में बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं लेकिन किसी और पेशे से जुड़े हैं, तो भी आप बच्चों को पढ़ा सकेंगे। मोदी सरकार आपको पढ़ाने के अपने सपने को पूरा करने का मौका देने जा रही है। ऐसे लोगों के लिए जो शिक्षक नहीं है लेकिन बच्चों को पढ़ाने की हसरत रखते हैं, मोदी सरकार 16 जून से विद्यांजलि योजना शुरू करने जा रही है। इसके तहत स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षक होने की बाध्यता खत्म होगी। इस योजना का मकसद आम जन को सरकारी स्कूलों से जोड़कर उनका विकास करना है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से विद्यांजलि योजना की शुरुआत 16 जून से हो गयी। पहले चरण में देश के 210 राज्यों के सरकारी स्कूलों में योजना लागू होगी। बीते आठ फरवरी को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की राज्यों के अफसरों के साथ बैठक में इस योजना के संचालन पर सहमति बनी।

खास बात है कि हुनरमंद महिलाओं के साथ कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति या एनआरआई स्कूलों में पढ़ा सकता है। रिटायर्ड शिक्षक, सरकारी कर्मी और सेना के जवान भी पे स्केल पर पढ़ा सकते हैं।

विद्यांजलि योजना के तहत कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति किसी भी सरकारी स्कूल से जुड़ सकता है। इसके लिए mygov.in वेबसाइट पर स्कूल के नाम के साथ आवेदन करना होगा।

पूर्ण गरीबी गंभीर अभाव, भूख, समयपूर्व मृत्यु और पीड़ा के मामले के रूप में देखी गई है। यह गरीबी की एक महत्वपूर्ण समझ का कब्जा करता है और इसकी प्रासंगिकता आज दुनिया के कुछ हिस्सों में फैली हुई है। यह कार्रवाई की जरूरी आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करती है हालांकि, कुछ परिस्थितियां हैं, जैसे कि भुखमरी या असुरक्षित पानी, जो तत्काल मृत्यु की ओर ले जाते हैं, इनमें से अधिकांश मानदंडों को निर्णय और तुलना की आवश्यकता होती है। 

जैसे, 1995 में संयुक्त राष्ट्र ने गरीबी की दो परिभाषाओं को अपनाया

संपूर्ण गरीबी को परिभाषित किया गया था:

"भोजन, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता सुविधाओं, स्वास्थ्य, आश्रय, शिक्षा और सूचना सहित बुनियादी मानवीय जरूरतों के गंभीर अभाव के कारण एक ऐसी स्थिति होती है, जो केवल आय पर ही नहीं बल्कि सेवाओं तक पहुंच पर निर्भर करती है।"

"कुल गरीबी विभिन्न रूपों में शामिल है, जिनमें शामिल हैं: आय और उत्पादक संसाधनों की कमी, स्थायी जीवनसाध्य, भूख और कुपोषण, बीमार स्वास्थ्य, सीमित और शिक्षा और अन्य बुनियादी सेवाओं तक पहुंच की कमी, बीमारी से रोग और मृत्यु दर में वृद्धि, बेघर और अपर्याप्त आवास असुरक्षित वातावरण और सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार.यह निर्णय लेने में और सिविल, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी की कमी के कारण भी होता है। यह सभी देशों में होता है: कई विकासशील देशों में गरीबी, गरीबी की जेबें विकसित हुईं देशों, आर्थिक मंदी के कारण आजीविका के नुकसान, आपदा या संघर्ष के कारण अचानक गरीबी, कम मजदूरी वाले श्रमिकों की गरीबी, और परिवार के समर्थन प्रणाली, सामाजिक संस्थानों और सुरक्षा नेट से बाहर गिरने वाले लोगों की निराशा होती है। "

ये गरीबी की रिश्तेदार परिभाषाएं हैं, जो समाज के भीतर रहने वाले न्यूनतम स्वीकार्य मानकों के मामले में गरीबी को देखते हैं, जिसमें किसी विशेष व्यक्ति का जीवन रहता है। (संयुक्त राष्ट्र, 1 99 5) लेकिन 'समग्र गरीबी' आगे चला जाता है, कई कारकों को पहचानना जो कि वंचितों में योगदान दे सकता है 2010 में, संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य और शिक्षा को कवर करने वाले एक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) को अपनाया, साथ ही साथ रहने के मानकों का भी मूल्यांकन किया।

पुणे की परसिस्टेंट सिस्टम्स ने भर्तियों की पुरानी प्रथा को तोड़ते हुए अपनी टीम में कुछ फ्रीलांसरों और कंसल्टंट्स को शामिल कर लिया जिन्होंने कम वक्त के एक प्रॉजेक्ट पर काम किया। जॉब की दुनिया में यह थोड़ा नया आइडिया है जो ग्लोबल टेक्नॉलजी सर्विस इंडस्ट्री में धीरे-धीरे जोर पकड़ता जा रहा है। इसे 'गिग इकॉनमी' या वर्कफोर्स का ऊबराइजेशन (ऐप बेस्ड कैब मुहैया करानेवाली कंपनी ऊबर की तरह इस्तेमाल किया जाना) कहा जा रहा है, जहां लोग डिमांड-सप्लाइ मॉडल पर काम करते हैं। इसमें डिमांड और इंट्रेस्ट एरियाज के लिहाज से विभिन्न प्रॉजेक्ट्स के लिए एक से दूसरी कंपनी का भ्रमण करते रहते हैं। 

परसिस्टेंट सिस्टम्स के चीफ पीपल ऑफिसर समीर बेंद्रे ने कहा, 'हालांकि यह (ऊबराइजेशन) सर्विसेज कंपनियों में बड़े पैमाने पर अब तक नहीं दिखा है, लेकिन इसकी शुरुआत हो चुकी है।' उन्होंने कहा, 'कुछ पॉकेट्स में हम इसका प्रयोग कर रहे हैं... हमें लगता है कि कुछ क्षेत्रों में इसके इस्तेमाल के अच्छे अवसर हैं। मसलन, अगर महिलाएं मातृत्व अवकाश के बाद कम पर लौट रही हों तो।'

इन्फोसिस और विप्रो समेत दूसरी भारतीय आईटी कंपनियां 'ऊबराइज्ड वर्कफोर्स' के आइडिया पर विचार कर रही हैं। इस ट्रेंड के जोर पकड़ने के पीछे मार्केट में उठापटक और इंडियन आईटी सर्विसेज के सबसे बड़े मार्केट अमेरिका में बदली राजनीतिक स्थिति से कहीं बड़ी वजह युवाओं की प्राथमिकताओं का बदलना है। 

इन्फोसिस में एचआर हेड रिचर्ड लोबो ने कहा, 'वर्कफोर्स में मिलेनियल्स के बढ़ते दबदबे से वो सारी धारणाएं टूट रही हैं जो किसी एंप्लॉयी को कंपनी से जुड़ा और प्रेरित रखती थीं।' उन्होंने कहा, 'हम ज्यादा-से-ज्यादा मिलेजुले वर्कफोर्स के साथ डील कर रहे हैं जहां फुल टाइम और पार्ट टाइम एंप्लॉयी एक ही जगह पर काम करते हैं, लेकिन दोनों की जरूरतें बिल्कुल भिन्न हैं।'

लोबो कहते हैं कि फुल टाइम जॉब नहीं करने की चाहत रखनेवालों की तादाद बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा, 'जिस तरह लोगों को ऑन डिमांड कारों से आवाजाही की आदत हो गई है, उसी तरह एंप्लॉयर्स भी उन खास कामों के लिए लोगों की ऑन डिमांड हायरिंग कर लेंगे जिन्हें रेग्युलर स्टाफ नहीं निपटा सकते।' 

पिछले साल जब विप्रो ने अमेरिकी आईटी कंसल्टिंग फर्म ऐपिरियो का अधिग्रहण किया था, तब सीईओ आबिदअली नीमचवाला ने कहा था, 'हमें लगता है कि आईटी इंडस्ट्री में कामकाज का भविष्य कुछ हद तक ऊबराइज्ड होने जा रहा है।' 

दुनिया में कई ऐसे इलाके हैं जहां नये देश बनाने की मांग उठ रही है. आइए नजर डालते हैं दुनिया के सबसे नये नवेले देशों पर :

दक्षिणी सूडान

दक्षिणी सूडान दुनिया का सबसे नया देश है, जिसने 9 जुलाई 2011 को सूडान से आजादी का एलान किया. लेकिन आजादी के बाद से इस देश का सफर अच्छा नहीं रहा. तेल के संसाधनों से मालामाल साउथ सूडान गरीबी और सूखे का शिकार है. इसके अलावा राजनीतिक अस्थिरता और गृह युद्ध ने भी इस देश को उबरने नहीं दिया है.

कोसोवो

कोसोवो ने एकतरफा तौर पर 17 फरवरी 2008 को सर्बिया से आजादी की घोषणा की. सर्बिया के साथ साथ रूस ने भी इस कदम का विरोध किया. कोसोवो को अमेरिका और यूरोपीय संघ के बड़े देशों ने मान्यता दे दी है लेकिन अभी तक वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है.

मोंटेनेग्रो और सर्बिया

1991 में यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया और मोंटेनेग्रो के नाम से एक देश की स्थापना हुई. लेकिन 2006 में उसका बंटवारा हो गया. मोंटेनेग्रो और सर्बिया दो अलग अलग देश बन गए. अलग होने की शुरुआत मोंटेनेग्रो ने की और 21 मई 2006 को एक जनमत संग्रह कराया. इसमें 55 प्रतिशत लोगों ने सर्बिया से अलग होने के हक में फैसला दिया.

पूर्वी तिमोर

पूर्वी तिमोर को अब तिमोर लेस्ते के नाम से जाना जाता है. उसे 20 मई 2002 को इंडोनेशिया से आजादी मिली. हालांकि इंडोनेशिया से अलग होने का फैसला पूर्वी तिमोर के लोग एक जनमत संग्रह में कई साल पहले ही कर चुके थे. जनमत संग्रह के बाद इलाके में हिंसा भड़क उठी. इंडोनेशिया समर्थक चरमपंथियों ने लोगों पर हमले किए, जिसके बाद वहां संयुक्त राष्ट्र बलों को तैनात करना पड़ा था.

पालाऊ

पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित पालाऊ 250 द्वीपों में फैला हुआ है, जिसकी आबादी 21 हजार से भी कम है. इसे एक अक्टूबर 1994 को आजादी मिली. हालांकि सांस्कृतिक और भाषाई अंतरों को देखते हुए पालाऊ ने इससे 15 साल पहले ही माइक्रोनेशिया से अलग होने का फैसला कर लिया था. संपन्न पर्यटन उद्योग के कारण उसे प्रशांत क्षेत्र के अमीर देशों में गिना जाता है.

एरिट्रिया

संयुक्त राष्ट्र ने 1952 में एरिट्रिया को इथियोपिया में एक स्वायत्त क्षेत्र के तौर पर स्थापित किया. लेकिन सम्राट हेले सेलासी ने 1962 में इसे पूरी तरह अपने राज्य का हिस्सा बना लिया. इससे वहां गृह युद्ध छिड़ गया जो 30 साल चला. लेकिन 1991 में इरीट्रियन पीपल्स लिबरेशन फ्रंट ने इथियोपिया की सेना को वहां से भगा दिया और दो साल बाद 1993 में आजादी की घोषणा की.

चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया

एक जनवरी 1993 को चेकोस्लोवाकिया को संसद ने भंग कर दिया और नतीजतन में दो अलग अलग देश अस्तित्व में आये. चेक गणराज्य और स्लोवाकिया. एक पार्टी वाले कम्युनिस्ट शासन को खत्म करने वाली "वेलवेट क्रांति" के बाद यह "वेलवेट डायवोर्स" था. दोनों ही देश अब यूरोपीय संघ का हिस्सा है जबकि स्लोवाकिया ने तो यूरो को भी अपना लिया है.

नामीबिया

अफ्रीकी देश नामीबिया 1990 तक दक्षिण अफ्रीका का हिस्सा था. कभी जर्मनी का उपनिवेश रहे नामीबिया पर पहले विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण अफ्रीका ने कब्जा कर लिया था. लेकिन 21 मार्च 1990 को यह दक्षिण अफ्रीका से आजाद हो गया. इसकी आजादी के लिए 20 साल तक साउथ वेस्ट अफ्रीका पीपल्स ऑर्गेनाइजेशन नाम के गुट ने छापामार अभियान चलाया था.

सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम किसानों के लिए शुरू की गयी एक क्रांतिकारी योजना है जिससे किसानों की खेती और उपज पर काफी फर्क पड़ रहा है। इससे फसल की  उत्पादकता में वृद्धि हो रही है और खेती की लागत कम हो रही है। इस स्कीम का शुभारंभ माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़, राजस्थान में किया गया था। सॉयल हेल्थ कार्ड मिट्टी के पोषक तत्वों की स्थिति एवं और मिट्टी की उर्वरकता में सुधार के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले पोषक तत्वों की उचित मात्रा की सिफारिश की जानकारी किसानों को प्रदान करता है। इससे किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती  है।

इसके बाद किसान उसी अनुसार खेत में उर्वरक और अन्य रसायन डालता है। इससे लागत में कमी आती है और उत्पादन में वृद्धि होती है।  सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम के पहले 2 वर्षीय चक्र (2015-17) में अभी तक 2.53 करोड़ लक्षित नमून एकत्र किए जा चुके  हैं एवं 93% नमूने परीक्षित किए जा चुके हैं। राज्य सरकारों द्वारा लगभग 14 करोड़ सॉयल हेल्थ कार्ड बनाए जा रहे हैं जिसमें 31 मई तक 8 करोड़ किसानों को कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। अगले तीन माह में शेष सभी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध करा दिए जाएंगे। देश में अब तक सॉयल हेल्थ कार्ड के इस्तेमाल से काफी अच्छे परिणाम आए हैं।

16 राज्यों के 136 जिलों के किसानों से आई प्रतिक्रिया निम्नलिखित तथ्य दर्शाती है:-

1) नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग में कमी आयी है और फॉस्फोरस पोटाश और सूक्ष्मपोषक तत्वों के उपयोग में बढ़ोतरी हुई  है।

2) धान में 16% से 25%,  दालों और तिलहनों में 10% से 15% खेती की लागत में कमी की सूचना मिली है।

3) धान में 10% से 22%, गेहूं और ज्वार में 10% से 15%, दालों में 10% से 30% और तिलहन में 35% से 66% की उत्पादन वृद्धि दर्ज की गयी है।

चेनानी-नाशरी सुरंग जिसे पत्नीटॉप सुरंग के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 (राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या पुनः निर्धारण से पूर्व नाम राष्ट्रीय राजमार्ग 1ए ) पर स्थित एक सड़क सुरंग है। इसका कार्य वर्ष 2011 में आरम्भ हुआ तथा उद्धघाटन 2 अप्रैल 2017 को किया गया।

यह भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग है जिसकी लंबाई 9.28 कि.मी. (5.8 मील) है। सुरंग बनाने पर मूल अनुमानित लागत ₹ 2,520 करोड़ (यूएस $ 367.92 मिलियन) थी लेकिन परिवर्धित करने में कुल ₹ 3,720 करोड़ (यूएस $ 543.12 मिलियन) खर्च हुये। मुख्य सुरंग का व्यास 13 मीटर है, जबकि समानांतर निकासी सुरंग का व्यास 6 मीटर है। मुख्य और निकासी सुरंगों में 29 स्थानों पर पार मार्ग बनाये गये हैं जो हर 300 मीटर की दूरी पर स्थिति हैं। यह देश की पहली पूर्ण रूप से एकीकृत सुरंग प्रणाली वाली सुरंग है।

सुरंग की सहायता से जम्मू और श्रीनगर के मध्य दूरी 30.11 कि.मी. (18.7 मील) रह गयी और यात्रा समय में दो घण्टे की कटौती हो गयी। पत्नीटॉप पर सर्दियों में बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर बाधा उत्पन्न होती थी तथा प्रत्येक शीतकाल में कई बार वाहनों की लम्बी कतार के कारण भी बाधा उत्पन्न होती थी - कई बार कई दिनों तक कतार में रहना पड़ता था। सुरंग पत्नीटॉप, कुद और बटोत को उपमार्गों से जोड़ती है जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर सर्दियों में ट्रैफ़िक जाम की समस्या को कम किया है।

1. सुरंग निचले हिमालय परास में स्थिति है जिसकी ऊँचाई 1200 मीटर है।

2. चेनानी-नाशरी सुरंग को आस्ट्रिया की नई सुरंग प्रौद्योगिकी से बनाया गया है। इसमें सुरक्षा के कई प्रावधान हैं। सभी का संचालन एक सॉफ्टवेयर से होता है।

3. इस परियोजना को बनाने का टेंडर एनएचआई के साथ आईएल एंड एफएस को मिला था।

4. यह सुरंग जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग को चार लेन का करने की परियोजना का हिस्सा है। जम्मू-श्रीनगर के बीच यात्रा की अवधि घटाने के लिए बारह ऐसी ही और सुरंग परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है।

5. यह सुरंग ऊधमपुर जिले के चेनानी और रामबन जिले के नाशरी के बीच की 41 किलोमीटर की दूरी को घटाकर 10.89 किलोमीटर कर देगी और यह फासला महज दस मिनट में पार कर लिया जाएगा। अभी इसमें ढाई घंटे लगते हैं।

6. जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग को राज्य की जीवन रेखा माना जाता है।

7. सभी 12 सुरंगों का निर्माण पूरा होने के बाद जम्मू एवं श्रीनगर के बीच की 293 किलोमीटर की दूरी में से 62 किलोमीटर घट जाएंगे। यह 231 किलोमीटर की दूरी चार-साढ़े चार घंटे में तय कर ली जाएगी।

8. इस सुरंग की बेहद खास बात हर 150 मीटर पर एक आपातकालीन एसओएस कॉल बॉक्स और बाहर निकलने के लिए बचाव के रास्ते का होना है। इस रास्ते से होकर मुसाफिर सुरक्षा सुरंग तक जा सकेंगे जो इस मुख्य सुरंग के समानांतर बनाई गई है।

9. राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) ने फैसला किया है कि जम्मू एवं कश्मीर में लेह और श्रीनगर के बीच बनने वाली 14 किलोमीटर लंबी जोजी ला सुरंग को इसी तकनीक से बनाया जाएगा।

आजादी के करीब 70 साल बाद भारत की पहली मेड इन इंडिया ट्रेन 18.03.2017 से चलनी शुरू. रेलमंत्री सुरेश प्रभु मुंबई में ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे. भारत की स्वदेशी ट्रेन का नाम 'मेधा' रखा गया है. अपनी पहली यात्रा में मेधा ट्रेन ने मुंबई के चर्चगेट से लोकमान्य तिलक टर्मिनस (एलटीटी) तक की यात्रा की.

इससे पहले 'मेधा' ट्रेन का कई चरण में सफल ट्रायल किया जा चुका है. इस ट्रेन को कमिश्नर ऑफ रेल सेफ्टी (सीआरएस) की स्वीकृति मिल चुकी है. 

भारत की स्वदेशी ट्रेन में कई ऐसी खूबियां हैं जो उसे दुनिया के कई ट्रेनों से उसे अगल बनाती है. इस ट्रेन में एक साथ 6,050 यात्री यात्रा कर सकते हैं. इसमें 1,168 सीटे हैं. इस ट्रेन की स्पीड 110 किमी प्रति घंटा है.

इस ट्रेन में फ्रेश एयर कूलिंग क्षमता 16,000 प्रति घंटा मीटर क्यूबिक है. रिजेनरेटड ब्रेकिंग सिस्टम युक्त यह रेक 30 से 35 प्रतिशत बिजली परिचालन के दौरान बचा सकती है. रेलवे अधिकारी के मुताबिक मेड-इन-इंडिया ट्रेन 'मेधा' को बनाने में लगभग 43.23 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. जबकि विदेश से खरीदी जाने वाली बॉम्बार्डियर ट्रेन की कीमत 44.36 करोड़ रुपए है.

मेक इन इंडिया के तहत देश की पहली स्वदेशी लोकल 'मेधा' हैदराबाद मेधा सर्वो ड्राइव्स फर्म की ओर से प्रायोजित है और चेन्नई कोच फैक्ट्री में तैयार किया गया है. वर्तमान में मध्य और पश्चिम रेल पर परिचालित होने वाली लोकल चैन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) में तैयार होती है. इन लोकल ट्रेनों में इलेक्ट्रिक तकनीकी समेत अन्य तकनीकी संबंधी काम सीमेंस और बॉम्बार्डियर कंपनियों की देख रेख में होता है. ये कंपनियां विदेशी है.

संसद के बजट सत्र के दूसरा चरण चल रहा है. 14.03.2017 को लोकसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह शत्रु संपत्ति संशोधन बिल को पेश करेंगे. इसको लेकर बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर सदन में मौजूद रहने को कहा है.

राज्यसभा करीब 50 साल पुराने शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन संबंधित बिल को पास कर चुका है. इस बिल में युद्ध के बाद पाकिस्तान और चीन पलायन कर गए लोगों की तरफ से छोड़ी गई संपत्ति पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान किए गए हैं. विभाजन या युद्ध के बाद गए लोगों की छूटी प्रॉपर्टी के दावों से निपटने के प्रावधान हैं. इसके मुताबिक पलायन करके वहां की नागरिकता लेने वाले लोगों की संपत्ति जब्त कर ली जाएगी.

भारत में रह रहे उत्तराधिकारियों का भी उनकी छूटी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहेगा. संशोधनों से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रभावित होने से ये मामला विवाद में भी है. संसद से पारित होने के बाद यह बिल इस संबंध में सरकार की तरफ से जारी किए गए ऑर्डिनेंस का स्थान लेगा.

48 साल पुराने इस एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट बिल को को राज्यसभा से पास कर दिया गया. हालांकि राज्यसभा में विपक्ष की गैरमौजूदगी में ये बिल पास किया गया था. राज्यसभा में लंबित रहने की वजह से सरकार को इसके लिए पांच बार ऑर्डिनेंस लाना पड़ा था.

विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने यह बिल राज्यसभा में धोखे से पास कराया है. विपक्ष की मांग थी कि इस विधेयक पर आज चर्चा नहीं की जाए और अगले सप्ताह इस पर व्यापक चर्चा की जाए जब सदन में ज्यादातर सदस्य मौजूद हो.

सरकार ने कैसे पास किया बिल : उस समय सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या कम थी और कांग्रेस के एक सदस्य ने कोरम का मुद्दा भी उठाया. हालांकि उपसभापति कुरियन ने गणना प्रकिया पूरी किए जाने के बाद कहा कि सदन में कोरम मौजूद है. बाद में सरकार के इस विधेयक के पारित कराने पर जोर दिए जाने पर कांग्रेस, वाम, तृणमूल सहित विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया था.

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 भारत सरकार द्वारा अधिसूचित एक कानून है जिसके माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में जनसाधारण को खाद्यान्न उपलब्ध हो सके।

भारतीय संसद द्वारा पारित होने के उपरांत सरकार द्वारा 10 सितम्‍बर, 2013 को इसे अधिसूचित कर दिया गया।

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्‍य लोगों को सस्‍ती दर पर पर्याप्‍त मात्रा में उत्‍तम खाद्यान्‍न उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मिले और वे सम्‍मान के साथ जीवन जी सकें।

मुख्य प्रावधान

इस कानून के तहत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 75 प्रतिशत तक तथा शहरी क्षेत्रों की 50 प्रतिशत तक की आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्‍न उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इस प्रकार देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्‍या को इसका लाभ मिलने का अनुमान है। पात्र परिवारों को प्रतिमाह पांच कि. ग्रा. चावल, गेहूं व मोटा अनाज क्रमशः 3, 2 व 1 रुपये प्रति कि. ग्रा. की रियायती दर पर मिल सकेगा। अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) मे शामिल परिवारों को प्रति परिवार 35 कि. ग्रा. अनाज का मिलना पूर्ववत जारी रहेगा। इसके लागू होने के 365 दिन के अवधि के लिए, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएम) के अंतर्गत‍ सब्सिडीयुक्‍त खाद्यान्‍न प्राप्‍त करने हेतु, पात्र परिवारों का चयन किया जाएगा। गर्भव‍ती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गर्भावस्‍था के दौरान तथा प्रसव के छ: माह के उपरांत भोजन के अलावा कम से कम 6000 रुपये का मातृत्‍व लाभ भी मिलेगा।

14 वर्ष तक की आयु के बच्‍चे पौष्टिक आहार अथवा निर्धारित पौष्टिक मानदण्‍डानुसार घर राशन ले जा सकें।खाद्यान्‍न अथवा भोजन की आपूर्ति न हो पाने की स्थिति में, लाभार्थी को खाद्य सुरक्षा भत्‍ता दिया जाएगा। इस अधिनियम के जिला एवं राज्‍यस्‍तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्‍थापित करने का भी प्रावधान है।

पारदर्शिता एवं उत्‍तरदायित्‍व सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्‍यक प्रावधान किए गए हैं।

नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) अर्थात् राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क ज्ञान, कौशल और अभिरुचि के अनेक स्तरों के अनुसार योग्यताएं निर्धारित करता है. इन स्तरों को सीखने के परिणामों के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है, जो प्रशिक्षार्थी को अवश्य हासिल करने होते हैं, भले ही ये कौशल उसने औपचारिक या अनौपचारिक प्रशिक्षण के जरिए हासिल न किए हों. इस अर्थ में एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क है. अत: यह एक राष्ट्रीय एकीकृत शिक्षा और योग्यता आधारित कौशल फ्रेमवर्क है, जो व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के रूप में समानांतर और शीर्षवत दोनों ही दिशाओं में अधिसंख्य मार्ग प्रदान करेगा. इस तरह यह फ्रेमवर्क सीखने के एक स्तर को अन्य उच्चतर स्तर के साथ भी जोड़ेगा. इससे कोई व्यक्ति वांछित सक्षमता स्तर हासिल कर सकेगा, व्यवसाय बाजार में प्रवेश कर सकेगा और अवसर पाकर अपनी सक्षमताओं को उन्नत बनाने के लिए अतिरिक्त कौशल हासिल कर सकेगा.

एनएसक्यूएफ के मुख्य तत्व इस प्रकार हैं:-

क)विभिन्न स्तरों पर कौशल प्रवीणता और सक्षमताओं की पहचान के लिए राष्ट्रीय सिद्धांत निर्धारित करना ताकि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के समकक्ष बनाया जा सके.

ख)व्यावसायिक शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और व्यवसाय बाजार में प्रवेश करने और बाहर आने के अधिसंख्य अवसर प्रदान करना.

ग)कौशल योग्यता फ्रेमवर्क के भीतर प्रगति मार्ग निर्धारित करना.

घ)जीवन पर्यंत प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसरों को बढ़ावा देना.

ङ)उद्योग/नियोक्ताओं के साथ साझेदारी.

च) विभिन्न क्षेत्रों के बीच कौशल विकास के लिए एक पारदर्शी, जवाबदेह और भरोसेमंद व्यवस्था कायम करना.

छ)पहले सीखी गई चीजों को मान्यता देने की अधिक क्षमता कायम करना.

योग्यता फ्रेमवर्क स्कूलों, व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदाताओं, उच्चतर शिक्षा संस्थानों, प्राधिकरणों और उद्योग एवं उसके प्रतिनिधिक निकायों, संघों, व्यावसायिक असोसिएशनों और लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के प्रत्यायन के लिए लाभदायक है. इस फ्रेमवर्क के सबसे बड़े लाभार्थियों में वे प्रशिक्षक शामिल हैं, जो फ्रेमवर्क में किसी विशेष स्तर पर किसी योग्यता के सापेक्षिक मूल्य का परीक्षण कर सकते हैं और उनकी व्यावसायिक प्रगति के मार्गों के बारे में विवेकपूर्ण निर्णय कर सकते हैं.

योग्यता फ्रेमवर्क संबंधी अंतर्राष्ट्रीय अनुभव

जानकारी पर आधारित शिक्षा से प्रशिक्षण परिणामों पर आधारित शिक्षा की दिशा में एक आदर्श परिवर्तन हो रहा है. परिणाम आधारित प्रशिक्षण का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जा रहा है. परिणाम आधारित प्रशिक्षण की दिशा में बदलाव कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं:-

क) यह पद्धति शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदाताओं की बजाय उसके इस्तेमालकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित करती है.

ख) किसी प्रशिक्षण प्र्रिक्रया के अंत में किसी प्रशिक्षार्थी से क्या जानने, समझने अथवा क्या करने की अपेक्षा की जाती है, यह स्पष्टीकरण प्रशिक्षार्थियों को इस बात को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है कि किसी पाठ्यक्रम विशेष में क्या प्रस्तावित किया गया है और इसका संबंध अन्य पाठ्यक्रमों और कार्र्यक्रमों के साथ कैसे जुड़ता है.

ग) यह योग्यताओं में पारदर्शिता बढ़ाता है और जवाबदेही सुदृढ़ करता है, जो अलग-अलग प्रशिक्षार्थियों और नियोक्ताओं के लिए लाभदायक है.

विश्व के औद्योगिक और विकासशील देशों में से अधिकतर अपनी योग्यताओं के फ्रेमवर्क में सुधार कर रहे हैं और साथ ही ऐसा फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं, जिससे इन योग्यताओं को एक-दूसरे के साथ जोड़ा जा सके और समाज तथा श्रम बाजार में नई मांगें आमतौर पर पूरी की जा सकें. इन प्रणालियों के विकास को अक्सर उच्चतर शिक्षा, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (टीवीईटी) और जीवन पर्यंत शिक्षा में हो रहे परिवर्तनों के साथ जोड़ा जाता है.

विश्वभर में अनेक देश योग्यता फ्रेमवर्क शुरू करने की प्रक्रिया में हैं. हालांकि सभी फ्रेमवर्कों के सैद्धांतिक मानदंड अधिकतर समान हैं, परंतु फ्रेमवर्क शुरू करने के लक्ष्य भिन्न हैं. चाहे शिक्षा और प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता और उनका लचीलापन बढ़ाने, पहले से प्राप्त किए गए प्रशिक्षण को आसानी से मान्यता प्रदान करने, जीवन पर्यंत प्रशिक्षण को बढ़ावा देने, योग्यता प्रणालियों की पारदर्शिता में सुधार लाने, उनकी साख बढ़ाने और उनके हस्तांतरण के लिए संभावनाएं पैदा करने या गुणवत्ता आश्वासन प्रणालियों का विकास करने, जैसे विषयों के लिए सरकारें निरंतर योग्यता फ्रेमवर्कों को सुधार के लिए एक नीतिगत साधन के रूप में अपना रही हैं.

भारत में योग्यता फ्रेमवर्क की आवश्यकता

भारत में सामान्य शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण पृथक दायरों में प्रचालित किए जा रहे हैं और दोनों के बीच परस्पर संबंध बहुत कम हैं. इससे व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण को अपनाने में युवाओं को संकोच होता है, क्योंकि यह समझा जाता है कि यह क्षेत्र सम्बद्ध व्यक्ति को उच्चतर डिग्रियां और योग्यताएं हासिल करने से रोकता है. व्यावसायिक शिक्षा से सामान्य शिक्षा और इसके विपरीत दिशा में गतिशीलता बढ़ाने के लिए, भारत के लिए एक योग्यता फ्रेमवर्क अर्थात् राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) आवश्यक है, जो योग्यताओं को अधिक समझने योग्य और पारदर्शी बनाने में मदद करेगा. एनएसक्यूएफ की आवश्यकता निम्नांकित अतिरिक्त कारणों से भी है:-

क) अभी तक शिक्षा और प्रशिक्षण का फोकस लगभग पूरी तरह जानकारी पर आधारित रहा है. एनएसक्यूएफ परिणाम आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है और एनएसक्यूएफ में प्रत्येक स्तर सक्षमता के संदर्भ में निर्धारित और वर्णित किया जाता है, जो हासिल किया जाना अपेक्षित होता है. इनमें से प्रत्येक सक्षमता स्तर के समरूप व्यावसायिक भूमिकाओं का निर्धारण उद्योग की भागीदारी से, सम्बद्ध क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) के जरिए किया जाता है.

ख) सीखने और आगे बढऩे के मार्ग, विशेषकर व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में, सामान्यत: अस्पष्ट या नदारद होते हैं. समानांतर गतिशीलता का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. एनएसक्यूएफ प्रगति के मार्गों को पारदर्शी बनाएगा ताकि संस्थान, विद्यार्थी और कर्मचारी स्पष्ट रूप से यह समझ सकें कि किसी विशेष पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते तथा योग्यताओं में असमानता और भेदभाव के मुद्दों का समाधान कैसे किया जा सकता है.

ग) संस्थानों के बीच विभिन्न योग्यताओं से सम्बद्ध परिणामों में एकरूपता का अभाव है. प्रत्येक संस्थान के पाठ्यक्रमों के बारे में पृथक अवधि, पृथक सिलेबस, भर्ती और पाठ्यक्रम के नाम के बारे में अलग-अलग जरूरतें हैं. इससे अक्सर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रमाणपत्रों/डिप्लोमा/ डिग्रियों की समकक्षता कायम करने में समस्याएं आती हैं. इसका दुष्प्रभाव विद्यार्थियों की रोजगार सक्षमता और गतिशीलता पर पड़ता है.

घ)योग्यताओं की गुणवत्ता के विकास से व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण से सम्बद्ध नकारात्मक धारणा महत्वपूर्ण ढंग से दूर की जा सकती है, इससे डिग्रियों और डॉक्टोरेट उपाधियों सहित उच्चतर शिक्षा ग्रहण करने की भी अनुमति मिलती है.

ङ) लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जिन्होंने अनौपचारिक क्षेत्र में कौशल हासिल किया है, परंतु उनके पास अपने कौशल को दर्शाने के लिए आवश्यक औपचारिक प्रमाणपत्र नहीं हैं. सक्षमता आधारित और परिणाम आधारित योग्यता फ्रेमवर्क के रूप में एनएसक्यूएफ पूर्व प्रशिक्षण को मान्यता (आरपीएल) प्रदान करेगा, जिसका वर्तमान शिक्षा और प्रशिक्षण के परिप्रेक्ष्य में व्यापक अभाव है.

च) अधिसंख्य भारतीय योग्यताएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय योग्यताएं राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं हैं. इससे विद्यार्थियों और कार्मिकों के समक्ष समस्या पैदा होती है, क्योंकि उनकी अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता पर दुष्प्रभाव पड़ता है और उन्हें फिर से वह योग्यता प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम करना होता है, जो मेजबान देश में मान्यताप्राप्त हो. एनएसक्यूएफ सम्बद्ध द्विपक्षीय और बहुराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से भारतीय योग्यताओं को अंतर्राष्ट्रीय योग्यताओं के अनुरूप बनाने में मदद करेगा. अनेक देश पहले से ही योग्यता फ्रेमवर्कों के जरिए अपनी योग्यताओं को अंतर्राष्ट्रीय योग्यताओं के अनुरूप बनाने की प्र्रिक्रया में हैं.

छ)एनएसक्यूएफ में एकीकृत साख संचय और अंतरण प्रणाली, लोगों को उनके जीवन में विभिन्न स्तरों पर उनकी जरूरतों और सुविधा के अनुसार शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार के बीच गतिशील होने की अनुमति प्रदान करेगी. किसी भी विद्यार्थी के लिए यह संभव हो सकेगा कि वह शिक्षा क्षेत्र को छोड़ सके, उद्योग में कुछ व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सके और अपने चुने हुए व्यवसाय में उच्चतर प्रगति करने के लिए वापस आकर योग्यताएं प्राप्त करने के लिए अध्ययन कर सके.

एनएसक्यूएफ के लक्ष्य

एनएसक्यूएफ के उद्देश्यों में एक ऐसा फ्रेमवर्क उपलब्ध कराना शामिल है, जो:-

क)भारतीय शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली की विविधता को समायोजित कर सके.

ख)देशभर में स्वीकृत परिणामों के आधार पर योग्यताओं के प्रत्येक स्तर के लिए एक सेट का विकास कर सके.

ग)प्रगति के मार्गों के विकास और रखरखाव के लिए एक ऐसा ढांचा उपलब्ध करा सके, जो योग्यताओं तक पहुंच प्रदान करे और लोगों को इन क्षेत्रों और श्रम बाजार के बीच  विभिन्न शैक्षिक और प्रशिक्षण क्षेत्रों में शीघ्र एवं सुगम प्रवेश एवं वापसी की सुविधा प्राप्त करने में सहायता कर सके. 

घ)लोगों को यह विकल्प प्रदान कर सके कि वे अपने पूर्व प्रशिक्षण और अनुभवों के लिए मान्यताप्राप्त करते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण के जरिए तरक्की कर सके.

ङ)शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय नियामक और गुणवत्ता आश्वासन प्रबंधों को नया आधार प्रदान कर सकें.

च)भारतीय योग्यताओं के महत्व और समतुल्यता को अधिक मान्यता देने के जरिए एनएफक्यूएस-अनुवर्ती योग्यताएं रखने वाले व्यक्तियों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता का समर्थन और संवर्धन करें.

एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क है

- यह भारतीय शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली के भीतर साख प्रदान करने और उसके स्थानांतरण और संवर्धन मार्गों को प्रोत्साहित करता है. यह शिक्षा और प्रशिक्षण में शामिल प्रत्येक पक्ष को देश में प्रस्तावित योग्यताओं के बीच तुलना करने में शामिल होने में मदद करता है और यह समझाता है कि इनमें प्रत्येक के बीच क्या संबंध है.

यह कैसे काम करता है?

नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क में 10 स्तर शामिल हैं. प्रत्येक स्तर अपने समनुरूप सक्षमता प्रदर्शित करने के लिए जटिलता, ज्ञान और स्वायत्तता का भिन्न स्तर प्रस्तुत करता है. फ्रेमवर्क का स्तर-1 निम्नतम जटिलता प्रस्तुत करता है, जबकि स्तर-10 सर्वाधिक जटिलता प्रस्तुत करता है. स्तरों को प्रशिक्षण के परिणामों के रूप में व्यक्त मानदंड द्वारा परिभाषित किया जाता है. योग्यताएं अर्जित करने के लिए धारणात्मक समय व्यक्त करते हुए प्रशिक्षण की मात्रा कुछ स्तरों और कुछ क्षेत्रों के लिए निर्धारित की जा सकती है, परंतु यह जानना महत्वपूर्ण है कि एनएसक्यूएफ के स्तर अध्ययन के वर्षों के साथ सीधे संबंधित नहीं हैं.उनका निर्धारण प्रशिक्षार्थी द्वारा सक्षमता की व्यापक श्रेणियों में की गई मांगों की सीमा द्वारा किया जाता है, जैसे व्यावसायिक जानकारी, व्यावसायिक कौशल, बुनियादी कौशल और उत्तरदायित्व. जीवन पर्यंत प्रशिक्षण के दौरान व्यक्ति निचले स्तरों से उच्चतर स्तर की ओर अथवा योग्यताओं के विभिन्न स्तरों के बीच आगे बढ़ते हैं, क्योंकि वे नया प्रशिक्षण और नए कौशल प्राप्त करते हैं. प्रत्येक एनएसक्यूएफ स्तर प्रशिक्षण परिणामों के रूप में व्यक्त वर्णनकर्ताओं के एक समूह द्वारा निर्धारित किया जाता है. प्रशिक्षण के परिणामों के बीच व्यापक तुलनाओं के लिए स्तर वर्णनकर्ताओं की परिकल्पना की गई है. परंतुऐसा नहीं है कि प्रत्येक योग्यता में स्तर निरूपकों द्वारा निर्धारित सभी विशेषताएं होंगी या होनी चाहिए.

एनएसक्यूएफ स्तर पर प्रत्येक योग्यता पाठ्यचर्या, धारणात्मक संपर्क घंटों, विषयों, अध्ययन की अवधि, कार्यभार, प्रशिक्षक गुणवत्ता और प्रशिक्षण संस्थान के प्रकार के संदर्भ में और भी परिभाषित की जा सकती है, ताकि यह कहा जा सके कि प्रशिक्षण प्र्रिक्रया के अंत में प्रशिक्षार्थी की कितनी योग्यता अपेक्षित अथवा प्रयोज्य है. समान स्तर पर दो या अधिक योग्यताओं को रखना केवल यह दर्शाता है कि वे परिणाम के सामान्य स्तर के संदर्भ में मोटेतौर पर समान हैं. इससे यह पता नहीं चलता कि उनका प्रयोजन और विषयवस्तु अनिवार्यत: एक समान है. एनएसक्यूएफ से संबंधित कुछ अन्य मुद्दे नीचे दिए गए हैं:-

क)कैरिकुलम पैकेज: सक्षमता आधारित पाठ्यचर्या पैकेज के अंतर्गत सिलेबस, विद्यार्थी नियमावली, प्रशिक्षक गाइड, प्रशिक्षण नियमावली, प्रशिक्षक योग्यताएं, दिशा-निर्देशों का मूल्यांकन और परीक्षण तथा मल्टी-मीडिया पैकेज और ई-सामग्री शामिल है. इन सब चीजों का विकास प्रत्येक एनएसक्यूएफ स्तर के लिए किया जाएगा, और जहां अपेक्षित होगा, क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) द्वारा पहचान किए गए विशेष योग्यता समूहों के लिए किया जाएगा. यह कार्य मंत्रालयों/विभागों, क्षेत्रगत कौशल परिषदों जैसी एजेंसियों और निर्दिष्ट नियामक निकायों या एनएसक्यूएफ के अनुसार किन्हीं अन्य निकायों द्वारा किया जाएगा. एनएसक्यूएफ पाठ्यचर्या प्रमापीय होनी चाहिए, जिसमें कौशल अर्जित करने और उसमें प्रवेश या बहिर्गमन की सुविधा होनी चाहिए. पाठ्यचर्या का डिजाइन एक साख फ्रेमवर्क के भी अनुरूप होना चाहिए, जो अर्जित साख और अर्जित सक्षमताओं को प्रदर्शित कर सके. प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण भी एनएसक्यूएफ के अनुरूप होना चाहिए.

)उद्योग सम्बद्धता: क्योंकि एनएसक्यूएफ एक परिणाम आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है, उद्योग जगत और नियोक्ताओं की भागीदारी एनएसक्यूएफ की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त है. इसमें व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा और कौशल विकास पाठ्यक्रम एनएसक्यूएफ के अनुसार और क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़), उद्योग और नियोक्ताओं के परामर्श से परिकल्पित, विकसित और वितरित किए जाएंगे. इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण संस्थान प्रदान करने में भी उद्योग सहायता कर सकते हैं.

ग)समानांतर और शीर्षवत गतिशीलता: समानांतर और शीर्षगत गतिशीलता को अंजाम देने के लिए निम्नांकित चीजें अनिवार्य हैं:-

-प्रत्येक स्तर ऊपर और नीचे के स्तरों से सम्बद्ध है. यदि ये कदम उद्योग क्षेत्र अथवा शैक्षिक क्षेत्र में गायब होंगे, तो एनएसक्यूएफ इन लापता स्तरों की पहचान करने और उन्हें प्रस्तुत करने में सहायता करेगा.

-इन अंतरालों को भरना होगा और इस प्र्रिक्रया में प्रमुख प्रशासनिक मंत्रालय, उस क्षेत्र में पहले से प्रचालित  नियामक निकायों, क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) और एनएसक्यूसी के हिस्सा होने के नाते अन्य सम्बद्ध पक्षों के साथ सलाह मशविरा करना होगा.

-एनएसक्यूएफ द्वारा वांछित समझी जाने वाली परवर्ती गतिशीलता की मात्रा की पहचान की जाएगी, और साख ग्रहण एवं अंतरण के जरिए उसमें मदद करनी होगी. तदनुरूप, एनएसक्यूएफ को ऐसे नियामक संस्थानों (जैसे यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीवीटी, तकनीकी और स्कूल बोर्ड आदि) की आवश्यकता पड़ेगी, जो एनएसक्यूएफ के प्रत्येक स्तर के लिए प्रवेश और बहिर्गमन के मानदंड हासिल की जाने वाली सक्षमताओं के संदर्भ में निर्धारित कर सकें, ताकि व्यावसायिक शिक्षा में शीर्षगत प्रगति को सुदृढ़ बनाया जा सके. यदि आवश्यक हो तो  इन स्तरों के जरिए प्रगति करने वाले व्यक्तियों की आपत्तियों पर विचार किया जा सकता है और उनका समाधान किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, यह व्यवस्था कक्षा 10-12, आईटीआई और पोलीटेक्निक संस्थानों के पासआउट विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अधिसूचित व्यावसायिक/तकनीकी/सामान्य शिक्षा के उच्चतर शिक्षा पाठ्यक्रमों और साथ ही बैचलर ऑफ वोकेशनल स्टडीज़ (बी.वीओसी) जैसे डिग्री स्तरीय पाठ्यक्रमों में प्रवेश करने में मदद करेगी. अर्जित सक्षमताओं और अर्जित साख पर विचार करते हुए, यदि वांछित हो तो पाठ्यक्रम में परिवर्तन भी संभव हो सकेगा. इसके अतिरिक्त कौशलयुक्त व्यक्तियों को विभिन्न स्तरों पर व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण से सामान्य शिक्षा और उच्चतर शिक्षा तथा इसके विपरीत परिवर्तन का विकल्प भी उपलब्ध होगा. इसके लिए स्कूल बोर्डों, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों द्वारा प्रदत्त मार्गों का इस्तेमाल किया जाएगा. यदि किसी उम्मीदवार में ‘‘सक्षमता संबंधी अंतरालों’’ की पहचान की जाएगी, तो संस्थानों द्वारा इन सक्षमताओं को अर्जित करने के लिए आदर्श पाठ्यचर्या पर आधारित ‘‘सेतु पाठ्यक्रम’’ का सहारा लिया जा सकता है.

घ) अंतर्राष्ट्रीय समकक्षता:- एनएसक्यूएफ भारतीय कौशल योग्यता स्तरों को अन्य देशों और क्षेत्रों के स्तरों से तुलना करने और उनके समरूप बनाने के माध्यम उपलब्ध कराएगा. इससे एनएसक्यूएफ-समनुरूप योग्यताधारकों को विश्व के विभिन्न भागों में काम करने और/या बसने में मदद मिलेगी. एनएसक्यूएफ विश्वभर में विकसित हो रहे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रीय फ्रेमवर्कों के साथ परस्पर संपर्क का माध्यम भी होगा.

ङ) स्तर वर्णनकर्ता:- एनएसक्यूएफ के अंतर्गत स्तर-1 से 10 तक 10 स्तर होंगे:-

(द्ब) एनएसक्यूएफ का प्रत्येक स्तर वर्णनकर्ताओं के एक समूह से सम्बद्ध होगा, जो 5 परिणाम वक्तव्यों से युक्त होंगे और यह तय करेंगे कि उक्त स्तर का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए किसी प्रशिक्षार्थी में सामान्यतौर पर न्यूनतम ज्ञान/कौशल और अभिलक्षण कितने अपेक्षित हैं.

(द्बद्ब) एनएसक्यूएफ के प्रत्येक स्तर का वर्णन 5 क्षेत्रों, जिन्हें वर्णनकर्ताओं का स्तर कहा जाएगा, पर आधारित होगा. ये पांच क्षेत्र इस प्रकार हैं:

 (क) प्रक्रिया,

 (ख) व्यावसायिक जानकारी

 (ग) व्यावसायिक कौशल

 (घ) बुनियादी कौशल और

 (ङ) उत्तरदायित्व.

पूर्व प्रशिक्षण की पहचान

पूर्व प्रशिक्षण की पहचान (आरपीएल), विशेषकर भारतीय संदर्भ में, जहां अधिसंख्य कार्मिकों को औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है, एनएसक्यूएफ से सम्बद्ध एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है.  एनएसक्यूएफ उन व्यक्तियों, जिन्होंने जीवन, कार्य और स्वैच्छिक गतिविधियों के जरिए, अनौपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है, के प्रशिक्षण को मान्यता प्रदान कराने में मदद करेगा. इसमें अर्जित ज्ञान और कौशल दोनों शामिल हैं:-

(क)औपचारिक प्रशिक्षण स्थितियों से बाहर प्राप्त ज्ञान.

(ख)कार्यस्थल, सामुदायिक स्तर और/या स्वयंसेवी क्षेत्र के जरिए अर्जित अनौपचारिक प्रशिक्षण.

(ग)सतत व्यवसाय विकास गतिविधियों से.

(घ)स्वतंत्र प्रशिक्षण से.

हितभागियों के कार्य/दायित्व:- एनएसक्यूएफ अनेक हितधारकों का संयुक्त दायित्व है और इसके विकास, कार्यान्वयन और रख-रखाव में प्रत्येक की अपनी-अपनी भूमिका है. प्रमुख हितधारकों की भूमिकाएं/दायित्व इस प्रकार हैं:-

(क) राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी (एनएसडीए)

एनएसडीए को एनएसक्यूएफ के संचालन और प्रचालन का दायित्व सौंपा गया है, ताकि गुणवत्ता और मानक विशेष क्षेत्रीय जरूरतों को पूरा कर सकें. एनएसडीए मौजूदा व्यावसायिक प्रमाणन निकायों के अतिरिक्त ऐसे अन्य निकायों की स्थापना में भी मदद करेगा. उपरोक्त कार्यों का निष्पादन करते हुए एनएसडीए यह सुनिश्चित करेगा कि एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क के रूप में काम करे और क्षमता निर्माण में मदद करे.

(ख) क्षेत्रगत कौशल परिषदें (एसएससीज़)

क्षेत्रगत परिषदें उद्योग के नेतृत्व में राष्ट्रीय भागीदारी संगठन हैं, जो सभी हितधारकों को अपने-अपने क्षेत्रों में एकजुट करेंगी. सम्बद्ध क्षेत्र में उद्योगों की जरूरतों के आधार पर, एसएससीज द्वारा एनओएस और क्यूपीज़ विकसित किए जा रहे हैं, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में विभिन्न कार्यभूमिकाएं निभा सकें और एनएसक्यूएफ के समुचित स्तरों को समनुरूप बना सकें. वे उद्योग क्षेत्र के लिए मौजूदा व्यावसायिक प्रशिक्षण और शिक्षा प्रणाली के पूरक के रूप में काम करेंगी ताकि मात्रा एवं गुणवत्ता की दृष्टि से सभी स्तरों पर सतत एवं विकासशील आधार पर प्रशिक्षित कार्मिकों की जरूरत समुचित मूल्य शृंखला के लिए पूरी की जा सके.

(ग) केंद्रीय मंत्रालय

शीर्ष मुद्दे प्रशासनिक नियंत्रण में होने को देखते हुए केंद्रीय मंत्रालयों को नेतृत्व प्रदान करना पड़ेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्र्यक्रमों से सम्बद्ध सभी हितधारक एनएसक्यूएफ के तत्वावधान के अंतर्गत संस्थानों/निकायों द्वारा प्रस्तावित किए जा रहे कार्यक्रमों के अनुरूप काम करें.

(घ) राज्य सरकारें

सम्बद्ध राज्य सरकारें अपने नियंत्रण के अंतर्गत आने वाले संस्थानों/निकायों को प्रेरित करेंगी, कि वे अपने प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को एनएसक्यूएफ के अनुरूप बनाएं, क्योंकि इससे ऐसी योग्यताएं रखने वाले व्यक्तियों को अधिक गतिशीलता प्राप्त होगी. राज्य सरकारें ऐसे तौर-तरीके निर्धारित करने में भी मदद करेंगी, जो क्षेत्रीय अंतरों के लिए व्यवस्था करते हुए यह सुनिश्चित कर सकें कि एनएसक्यूएफ से सम्बद्ध गुणवत्ता आश्वासन की अनदेखी न हो.

(ङ) नियामक संस्थान

सभी वर्तमान नियामक संस्थान (जैसे यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीवीटी, तकनीकी और स्कूल बोर्ड आदि) एनएसक्यूएफ स्तरों के संदर्भ में सक्षमताओं और योग्यताओं के प्रवेश और बहिर्गमन को परिभाषित करेंगी, ताकि सामान्य और व्यावसायिक शिक्षा दोनों में ही शीर्षवत प्रगति सुदृढ़ की जा सके और व्यावसायिक पासआउट डिग्री स्तरीय पाठ्यक्रमों सहित व्यावसायिक/ तकनीकी/सामान्य शिक्षा में उच्चतर शिक्षा के सम्बद्ध पोर्टलों में प्रवेश पा सकें.

(च) प्रशिक्षण प्रदाता/संस्थाएं/संस्थान

सभी प्रशिक्षण प्रदाताओं को अपने पाठ्यक्रमों/कार्र्यक्रमों का संचालन करना होगा ताकि एनएफक्यूएस स्तरों के साथ समनुरूपता सुनिश्चित की जा सके.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीण आवास योजना ‘ग्रामीण’ के क्रियान्वयन को अनुमति प्रदान कर दी है। इस योजना के तहत सभी बेघर और जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले लोगों को पक्का मकान बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु 2016-17 से 2018-19 तक तीन वर्षों में 81975 रुपये खर्च होंगे।

यह प्रस्तावित किया गया है कि परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 से 2018-19 के कालखंड में एक करोड़ घरों को पक्का बनाने के लिए मदद प्रदान की जाएगी। दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़ कर यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे भारत में क्रियान्वित की जाएगी। मकानों की क़ीमत केंद्र और राज्यों के बीच बांटी जाएगी।

क) प्रधानमंत्री आवास योजना की ग्रामीण आवास योजना- ग्रामीण का क्रियान्वयन। 

ख) ग्रामीण क्षेत्रों में एक करोड़ आवासों के निर्माण के लिए 2016-17 से 2018-19 तक तीन वर्षों में मदद प्रदान की जाएगी। 

ग) समतल क्षेत्रों में प्रति एकक 1,20,000 तक एवं पहाड़ी क्षेत्रों में 1,30,000 तक सहायता में बढ़ोतरी। 

घ) 21,975 करोड़ रुपए की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) से की जाएगी।

ड.) लाभान्वितों की पहचान के लिए सामाजिक-आर्थिक-जातीय जनगणना- 2011 का उपयोग। 

च) परियोजना के तहत लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी सहायता हेतु नेशनल टेकनिकल सपोर्ट एजेंसी का गठन।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ को मंजूरी दी जो किसानों के कल्याण के लिए लीक से हटकर एक अहम योजना है। किसान हितैषी सरकार का नया तोहफा:- 

(1). लोहिड़ी, पोंगल एवं बीहू जैसे त्यौहारों के शुभ अवसर पर किसान हितैषी सरकार ने किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के रूप में एक बड़ा तोहफा दिया। यह योजना खरीफ 2016 से लागू  है।

(2). किसानों के लिए बीमा योजनाएं समय-समय पर बनती रहीं हैं, किंतु इसके बावजूद अब तक कुल कवरेज 23 प्रतिशत हो सका है। 

(3). सभी योजनाओं की समीक्षा कर अच्छे फीचर शामिल कर किसान हित में और नए फीचर्स जोड़कर फसल बीमा योजना बनाई गई है। इस प्रकार यह योजना पुरानी किसी भी योजना से किसान हित में बेहतर है। (4). प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत फसल के अनुसार किसान द्वारा देय प्रीमियम राशि बहुत कम कर दी गई है जो निम्नानुसार हैः-

क्र. सं.             फसल किसान द्वारा देय अधिकतम बीमा प्रभार                     (बीमित राशि का प्रतिशत) 

1.                खरीफ                                                                               2.0% 

2.                रबी                                                                                   1.5% 

3.                वार्षिक वाणिज्‍यिक एवं बागवानी फसलें                                      5%

(5). वर्ष 2010 से प्रभावी Modified NAIS में प्रीमियम अधिक हो जाने की दशा में एक कैप निर्धारित रहती थी जिससे कि सरकार के द्वारा वहन की जाने वाली प्रीमियम राशि कम हो जाती थी, परिणामतः किसान को मिलने वाली दावा राशि भी अनुपातिक रूप से कम हो जाती थी। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में धान की फसल के लिए 22 प्रतिशत Actuarial Premium था। किसान को 30 हजार रुपए के Sum Insured पर कैप के कारण मात्र 900 रुपए और सरकार को 2400 रुपए प्रीमियम देना पड़ता था। किंतु शतप्रतिशत नुकसान की दशा में भी किसान को मात्र 15 हजार रुपए की दावा राशि प्राप्त होती। 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 30 हजार Sum Insured पर 22 प्रतिशत Actuarial Premium आने पर किसान मात्र 600 रुपए प्रीमियम देगा और सरकार 6000 हजार रुपए का प्रीमियम देगी। शतप्रतिशत नुकसान की दशा में किसान को 30 हजार रुपए की पूरी दावा राशि प्राप्त होगी अर्थात उदाहरण के प्रकरण में किसान के लिए प्रीमियम 900 रुपए से कम होकर 600 रुपए। दावा राशि 15000 रुपए के स्थान पर 30 हजार रुपए। 

(6). बीमित किसान यदि प्राकृतिक आपदा के कारण बोनी नहीं कर पाता तो यह जोखिम भी शामिल है उसे दावा राशि मिल सकेगी।

(7). ओला, जलभराव और लैण्ड स्लाइड जैसी आपदाओं को स्थानीय आपदा माना जाएगा। पुरानी योजनाओं के अंतर्गत यदि किसान के खेत में जल भराव (पानी में डूब) हो जाता तो किसान को मिलने वाली दावा राशि इस पर निर्भर करती कि यूनिट आफ इंश्योरेंस (गांव या गांवों के समूह) में कुल नुक्सानी कितनी है। इस कारण कई बार नदी नाले के किनारे या निचले स्थल में स्थित खेतों में नुकसान के बावजूद किसानों को दावा राशि प्राप्त नहीं होती थी। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में इसे स्थानीय हानि मानकर केवल प्रभावित किसानों का सर्वे कर उन्हें दावा राशि प्रदान की जाएगी।

(8). पोस्ट हार्वेस्ट नुकसान भी शामिल किया गया है। फसल कटने के 14 दिन तक यदि फसल ख्रेत में है और उस दौरान कोई आपदा आ जाती है तो किसानों को दावा राशि प्राप्त हो सकेगी। 

(9). योजना में टैक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा जिससे की फसल कटाई/नुकसान का आकलन शीघ्र और सही हो सके और किसानों को दावा राशि त्वरित रूप से मिल सके। रिमोट सेंसिंग के माध्यम से फसल कटाई प्रयोगों की संख्या कम की जाएगी। फसल कटाई प्रयोग के आंकड़े तत्कल स्मार्टफोन के माध्यम से अप-लोड कराए जाएंगे।

अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा सूचकांक में भारत लगातार पिछड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के वैश्विक बौद्धिक संपदा केंद्र जीआईपीसी की बौद्धिक संपदा वातावरण पर तैयार 45 देशों की सूची में भारत को 43वें स्थान पर रखा गया है। जीआईपीसी ने इस बात का भी जिक्र किया है कि सरकार को उल्लेखनीय विधायी सुधारों के जरिए अपनी आईपीआर नीति को सकारात्मक रख देना चाहिए। नवोन्मेषकों को इसकी जरूरत है। यह लगातार पांचवां साल है जबकि भारत इस सूची में निचले पायदान पर रहा है। हालांकि, 2017 की सूची इस लिहाज से कुछ सुधार दिखाती है कि पिछले चार साल के दौरान भारत आखिरी से एक पायदान ही उपर रहा था।

जीआईपीसी के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड हिरश्मैन ने कहा कि भारत में नवप्रवर्तन को लेकर पुरानी चुनौतियां कायम हैं। हालांकि इसने इस दिशा में थोड़ी प्रगति की है, लेकिन सरकार को विधायी सुधारों के जरिए आईपीआर नीति को सकारात्मक रख देना चाहिए।

प्रधानमंत्री स्वदेश दर्शन व प्रसाद योजना श्री नरेन्द्र मोदी सरकार की पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक बहुत ही विशेष पहल है, इसके अनुसार देश में जो पर्यटन स्थल है वहा की सार्वजानिक सुविधाओ एवं पर्यटन एवं पर्यटन से जुड़े पहलुओ पर ध्यान दिया जायेगा। इससे धार्मिक और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थलों को विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त बनाया जाएगा।

इन केंद्रों को बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से युक्त करने के साथ ही बेहतर पार्किंग, रहने के लिए अतिथिगृहों के निर्माण की योजना बनाई गई है।इसके तहत पर्यटन विभाग से जुडी सभी मूलभूत आवश्यकताओ की पूर्ती पर ध्यान दिया जायेगा ।

बुनियादी ढांचा के विस्‍तार, सड़क एवं परिवहन सुविधाओं, रेलवे, नागरिक उड्डयन और कौशल विकास प्रशिक्षण के जरिए उनके मंत्रालय देश में पर्यटन को बढ़ावा देने में कैसे मदद कर सकते हैं।

वाराणसी जैसे बौद्ध सर्किट के महत्‍वपूर्ण स्‍थलों को हेलिकॉप्‍टर सेवाओं से जोड़ना, महत्‍वपूर्ण पर्यटक स्‍थलों की रेलगाड़ियों में पर्यटकों के लिए विशेष डिब्‍बे, रोजगार बढ़ाने के लिए स्‍थानीय लोगों विशेष रूप से महिलाओं को पर्यटक गाइड के रूप में प्रशिक्षित करना, पर्यटन क्षेत्रों में परिवहन और ठहरने जैसी आधाभूत बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना शामिल है।

प्रदेश में पर्यटन विकास की दो परियोजनाओं के लिए वित्तीय वर्ष में केन्द्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय की ओर से राजस्थान सरकार को 104.40 करोड़ रूपए स्वीकृत किये गए एवं केंद्र के लिए इसका बजट 600 करोड़ रुपए रखा गयाइसके दौरान क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों (जेडसीसी) के साथ दोनों पहलों की शुरुआत साल 2016–17 तक अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की वर्तमान प्रतिशत 0.68 को बढ़ाकर 1 प्रतिशत प्राप्त करने के लिए की गई है।

इस योजना के अनुसार तीर्थ स्थलों पर ठहराव, पेयजल, स्नानागार, शौचालय, साफ-सफाई, बिजली, सुरक्षा आदि की बेहतर सुविधा उपलब्ध रहेगी। सभी कॉम्पलैक्स में सुविधाओं को बहाल रखने हेतु केयर-टेकर भी तैनात रहेंगे।

पर्यटन विभाग से हमारे देश में बहार से व्यापार आता है इससे देश में हर तरह से फायदा होता है पर्यटन से सभी को फायदा होता सरकार से लेकर एक वाहन चालक तक को इसी लिए सरकार ने सभी पर्यटन स्थलों के लिए इस योजना का आरम्भ किया ।

रायसीना डायलॉग 2017 के एक सत्र को संबोधित करते हुए विदेश सचिव जयशंकर ने जिस अंदाज में चीन व भारत के रिश्तों को परिभाषित किया है वह भारतीय कूटनीति के लिए नया है। जयशंकर ने कहा कि, ''भारत की प्रगति चीन के उदय के लिए कोई खतरा नहीं है लेकिन चीन को भारत की भौगोलिक संप्रभुता का सम्मान करना होगा।''

इसी सम्मेलन में पीएम नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले चीन को यह संकेत दिया था कि दूसरे देशों को जोड़ने की उसकी कोशिश में अन्य देशों की संवेदनाओं का सम्मान करना चाहिए। आज मोदी के बात को जयशंकर ने और स्पष्ट कर दिया। उन्होंने सीधे तौर पर कश्मीर होते हुए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने वाली चीन की सड़क परियोजना सीपीईसी का जिक्र करते हुए कहा कि, ''चीन एक ऐसा देश है जो अपनी संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील रहता है। ऐसे में उम्मीद की जाना चाहिए कि वे दूसरे देशों की संवेदनाओं का भी ख्याल रखेंगे। यह परियोजना भारत के एक संवदेनशील हिस्से से गुजरती है।''

हालांकि विदेश सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की संवेदनशीलता को लेकर चीन की तरफ से अभी तक कोई सकारात्मक रूख नहीं दिखाया गया है। भारतीय विदेश सचिव का बयान ऐसे आयोजन में आया है जिसमें पांच दर्जन से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। यहां से चीन को संदेश देने का अपना एक महत्व है।

कूटनीतिक सर्किल में माना जा रहा है कि भारत की नई सरकार ने जिस तरह से साहसिक कूटनीति को अख्तियार किया है यह उसी का नतीजा है। सनद रहे कि चीन व भारत के रिश्ते पिछले एक वर्ष से लगातार खराब हो रहे हैं। पहले एनएसजी के मुद्दे और उसके बाद पाक परस्त आतंकी मसूद अजहर के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी तनाव गहरा रहा है।

जयशंकर ने कहा कि हम चीन को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारी प्रगति उसके उदय के खिलाफ नहीं है। यह बात उसी तरह से है जिस तरह से हम यह समझते हैं कि चीन की प्रगति भी हमारे लिए कोई अवरोध नहीं है। वैसे आर्थिक व दोनों देशों के अवामों के बीच रिश्तों को सुधारने में काफी प्रगति हुई है लेकिन कुछ मूल मुद्दे हैं जहां रुकावटें हैं।

भारत की प्रति व्यक्ति आय 2016-17 में एक लाख रुपए को पार कर जाएगी। ऐसा पहली बार होगा। शुक्रवार को जारी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष प्रति व्यक्ति आय 1,03,007 रुपए रहने का अनुमान है। यह 2015-16 के 93,292 रुपए से 10.4% अधिक होगी। पिछले साल इसमें 7.4% वृद्धि हुई थी। 

सीएसओ ने जीडीपी के आंकड़े जारी करते वक्त कहा कि इसमें नोटबंदी के असर को शामिल नहीं किया गया है। प्रति व्यक्ति आय में इसे शामिल किया गया है या नहीं, यह साफ नहीं है। एक और गौर करने वाली बात यह है कि ये आंकड़े मौजूदा मूल्यों पर आधारित हैं। तुलना के लिए स्थिर मूल्यों पर आधारित आंकड़े अधिक वास्तविक होते हैं। इस हिसाब से देखें तो प्रति व्यक्ति आय 77,435 रु. से बढ़कर 81,805 रु. होने का अनुमान है। यानी इसमें 5.6% वृद्धि होगी। पिछले साल इसमें 6.2% वृद्धि हुई थी।

सीएसओ ने जीडीपी के भी आंकड़े जारी किए। 2011-12 के स्थिर मूल्यों के आधार पर इसके 7.6% से घटकर 7.1% रहने का अंदेशा व्यक्त किया गया है। लेकिन मौजूदा मूल्यों के आधार पर जीडीपी 135.76 लाख करोड़ से बढ़कर 151.93 लाख करोड़ रु. हो जाएगी। यानी यह 11.9% बढ़ जाएगी। 

विश्व औसत तक पहुंचने में लगेंगे 25 साल 

विश्वबैंक के अनुसार मौजूदा मूल्यों पर भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1,582 डॉलर है। इस लिहाज से हम गरीब देशों की श्रेणी में आते हैं। मध्य आय वाले देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी 6,000-7,000 डॉलर सालाना है। विश्व औसत 10,058 डॉलर का है। चीन का आंकड़ा 8,028 डॉलर है। अगर हम सालाना 8-9 फीसदी बढ़ें तो 9 साल में आमदनी दोगुनी होगी। यानी विश्व औसत तक पहुंचने में 25 साल लगेंगे।